Sunday, 15 April 2012

DOST.

            दोस्त तुम यादों में हो, वादों में हो, संवादों में हो
            गीतों में हो, ग़ज़लों में हो, ख़्वाबों में भी तुम ही तुम हो
चुप्पी में हो, खामोशी में हो, तन्हाई में हो
महफिल में हो, कहकसो  में हो और बेवफाई में भी तुम ही तुम हो
                         तुम उन चिट्ठियों में हो जो मैं तुम्हें दे न सका
                         तुम उस टीस में भी हो जो तुम मुझे देते रहे
 मैं उस मीठे दर्द को अल्फाजों में बदलता रहा
पर तुम ने उस दर्द का नाम ही यूँ बदल दिया 
                         नाराज होकर फेसबुक से अन्फ्रेंड कर दोगे तुम
                          डायरी से फाड़ कर , ग्रीटिंग्स कार्ड जला दोगे तुम
पर मेरी यादों से कैसे बच पाओगे बोलो तुम
चुप्पियाँ को मेरी अब कैसे सह पाओगे कहो  तुम

यादें और चुप्पियाँ एक-दूसरे की परछाई है तभी तो
चुप्पियाँ, यादों के समन्दर में डूबोती चली जाती हैं
            
                कहते है खामोशी पागल कर देती सब को है
                 शब्दों  का आना जरुरी है जो दिल को भर देती अब तो है

इसलिए शब्दों , आँसुओं का बाहर निकलना है जरुरी
मैं तो बाहर आ गया अब , तुम भी बाहर आ जाओ जल्दी

अब इस नाराजगी जो जल से तुम भी भूल जाओ
हो गई गलती मुझसे लो माफ़ी तुम ही दे जाओ

                                      इगो अब तुम छोड़ दो
                                  माफ़ी तुम भी मांग लो

फिर से एक बार सही दोस्ती को वो नाम दो
 दोस्ती सबसे प्यारी है , इसको अब पहचान दो  !! 

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