Monday, 16 April 2012

पिता का त्याग.

इस समाज में एक लड़की का क्या दर्जा है देवी का , गायत्री का, सरस्वती का, नहीं , यह पवित्र नाम अब केबल नाम ही रह गए है . अब आप सब को मैं बताती हूँ की आखिर हमारे समाज में एक लड़की का क्या दर्जा रह गया है , इस समाज मैं लड़की का एक ही दर्जा है और वो है 'सौदा' , जी हाँ इसमें चोकने वाली कोई बात नहीं , क्यूँ की यह पड़ने में सुनने में कितना भी अजीब लगे परन्तु सच यही है की अब लड़की का सिर्फ सौदा ही होता है .
  क्यूँ की एक बाबुल की बेटी का रूप चाहे कैसा भी हो पर वो अपने बाबुल की लाडली ही होती है और जब उस लाडली की शादी का समय आता है तब उस्सका सौदा होता है और वो यह की आप हमे बस इतने पैसे दे दे दो हम सब देख लेंगे ,और जब लड़के वालो को लगता है की यह लोग हमारे standard के नहीं है तो वो लड़की से रिश्ता तोड़ने की बात करता है और रिश्ता टूट जाने के डर से पिता अपनी हैसियत  भूल कर कर्ज लेकर अपनी बेटी विदा करता है और बेटी के जाने के बाद उस लड़की के मायके का रंग ही उद्द जाता है

                      जिन्दगी का सबसे बड़ा त्याग है एक पिता का ,
                                                               की रंग बेटी की जिन्दगी में है भरना ,
                      यही एक मात्र उनका अपना सपना ,
                                                     
                                                  भविष्य में क्या होगा हमरा इसकी परवाह नहीं ,
                     वर्तमान में रहे खुश बेटी हमारी सपना यही ,

                                                            लेकर कर्ज ही चाहे करनी पड़े विदाई ,
                      कोई गम नहीं इसका बेटी हुई पराई,

                                      ख़ुशी इतनी होती है की मेरी लाडली का घर बस गया ,

                                 अब चाहे मौत भी आ जाय इसका कोई डर नहीं !!!!  
                                                                     

Importance of Education for Girl Child.

Education is every child's basic right and forms the crux of societal and individual development. As a country identified with the lowest literacy levels for women and girls, education for the girl child becomes crucial to women empowerment and development. More often than not, it is women from the rural backdrops of the country that are subjected to lack of education and thus, lack of opportunities. Even for those with access to education, the quality of rural education leads them nowhere. This makes it imperative for important steps towards access to quality education for the girl child and the underprivileged children.

Rights based, equal-opportunities education, particularly education for the girl child, acts as the primary vehicle which works to lift them out of poverty and obtain the means to participate in their communities by being well-informed and good decision makers. The global community and the world bodies like the United Nations time and again underline the need to focus on urgent national and international step to be taken for ensuring educational for the girl child. Hundreds of millions of young children, mostly girls,  

throughout the world are often deprived of education along with other essential needs like adequate food, clothing and health care. Going by these yardsticks, the development of a Nation is truly measured by many indicators and among them literacy levels especially of women and girl children are vital. 

The literacy drive among the girl child would work as a catalyst for social uplift and there by ensure National progress . Keeping this as the desired endeayour, eradication of illiteracy and bringing the girl child into the realm of education has been a major National concern for last so many decades. Here, it would be only relevant to point to a puplication by the Directorate of Adult Education a, few years back where in a compendium 'Literacy in India' carried a cover page showing a young village girl holding the slate inscribed on it words, "अब मैं लिख सकती हूँ ". The picture-story only rightly emphasizes on the importance of education for girl child and how gender inequity in literacy drive continues to remain a serious challenge.Female education and the literacy drive have given the girl child the much - needed respect she has been striving . The real success story has been that it has mobilized people to think and to express themselves. The demand for a closer involvement between literacy and skill development training has also emerged.









Sunday, 15 April 2012

दुल्हन ही दहेज़ है.

ऐसा क्यूँ होता है की लड़की के पैदा होने पर घर में मातम सा छा जाता है , पर उसी लड़की की विदाई पर घर में ढोल -नगाड़े बज उठते  है ,लड़की का इस समाज में क्या कोई दर्जा है?  कोई इज्जत है?  हम सब बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते है?  महिला सशक्तिकरण की बाते करते है, लेकिन यह सब कुछ देखने और सुनने मात्र का ही है , सब कहते है की शादी बिना दहेज़ की करो पर मै आप से पूछना चाहती हूँ की क्या यह संभव हो पाया है नहीं, और शायद ही कभी हो पायेगा क्यूंकि  हमारे समाज में दहेज़ के लालची कम होने के बजाई बड़ते जा रहे है एक माता -पिता का बस एक ही सपना होता है , की उनकी बेटी एक सुखी घर जाकर अपना पूरा जीवन ख़ुशी से जिए और इसी ख़ुशी के लिए वो अपना सब कुछ बेटी को दहेज़ के रूप में देते है पर यह लाड , यह त्याग लड़के वाले क्या जाने ,यह प्यार भी उन्हे सौदा नजर आता है तभी तो दिन बा दिन नए सामान , गहने , आभूषण की मांग की जाती रहती है ऐसे भूखे लालची लोगो के लिए मै यह कहना चाहूंगी  "की तुम इतने खुशकिस्मत हो की एक पिता अपनी लाडली अपनी जिन्दगी ,बिना सोचे समझे तुम्हारी जिम्मेदारी समझकर सोंपता है और तुम उसके साथ कैसा सलूख करते हो , दहेज़ मांगने से पहले यह सोचो की जो दहेज़ दूसरो से माँगा जा रहा है ,वो खुद के खरीदने की औकात नहीं है इसलिए दूसरों से भीख मांग रहे हो ,
                                                                          शादी के दिन लड़की वाले क्यूँ सर झुका कर सबका स्वागत करे , अरे धन्यवाद और स्वागत तो लड़की वालो का होना चाहिए ,जिन्होंने इतना सुन्दर इंतजाम किया , तुम्हारा पेट भरा और अपनी बेटी दी ..
मेरी उन सभी लड़की वालो से विनती है की प्लीज़ अपने आप को झुकने मत दो , क्यूंकि आप सम्मान के भागीदार है आप को गर्व से खड़े होकर कहना चाहिए की यह मेरा दिया मेरी बेटी को प्यार से दिया  तोहफा है पेट भरने के लिए दहेज़ नहीं, क्यूंकि मै अपने घर का सबसे अनमोल गहना , रुपया दे रहा हूँ वो है मेरी बेटी  ,
क्यूंकि दुल्हन ही दहेज़ है ..................

DOST.

            दोस्त तुम यादों में हो, वादों में हो, संवादों में हो
            गीतों में हो, ग़ज़लों में हो, ख़्वाबों में भी तुम ही तुम हो
चुप्पी में हो, खामोशी में हो, तन्हाई में हो
महफिल में हो, कहकसो  में हो और बेवफाई में भी तुम ही तुम हो
                         तुम उन चिट्ठियों में हो जो मैं तुम्हें दे न सका
                         तुम उस टीस में भी हो जो तुम मुझे देते रहे
 मैं उस मीठे दर्द को अल्फाजों में बदलता रहा
पर तुम ने उस दर्द का नाम ही यूँ बदल दिया 
                         नाराज होकर फेसबुक से अन्फ्रेंड कर दोगे तुम
                          डायरी से फाड़ कर , ग्रीटिंग्स कार्ड जला दोगे तुम
पर मेरी यादों से कैसे बच पाओगे बोलो तुम
चुप्पियाँ को मेरी अब कैसे सह पाओगे कहो  तुम

यादें और चुप्पियाँ एक-दूसरे की परछाई है तभी तो
चुप्पियाँ, यादों के समन्दर में डूबोती चली जाती हैं
            
                कहते है खामोशी पागल कर देती सब को है
                 शब्दों  का आना जरुरी है जो दिल को भर देती अब तो है

इसलिए शब्दों , आँसुओं का बाहर निकलना है जरुरी
मैं तो बाहर आ गया अब , तुम भी बाहर आ जाओ जल्दी

अब इस नाराजगी जो जल से तुम भी भूल जाओ
हो गई गलती मुझसे लो माफ़ी तुम ही दे जाओ

                                      इगो अब तुम छोड़ दो
                                  माफ़ी तुम भी मांग लो

फिर से एक बार सही दोस्ती को वो नाम दो
 दोस्ती सबसे प्यारी है , इसको अब पहचान दो  !! 

अनमोल भाई-बहेन का प्यार.

 हमारे देश  में ये रीत तो बहुत समय पहले से चली आ रही है , हर भाई और बहेन का ये अनमोल रिश्ता  हर छेत्र के कोनो कोनो  में मनाया जाता है आखिर क्यूँ नहीं मनाया जाए  चाहिए, ये त्यौहार है ही ऐसा  जो जिन्दगी भर की रक्षा करने का होता है हर भाई अपनी बहेन से और हर बहेन अपने भाई से यही  कहती की,  जिन्दगी में चाहे कुछ भी हो चाहे कैसे भी मोड़ आ जाये पर हम हमेशा साथ ही रहेंगे और एक दुसरे की  रक्षा करेंगे ,  और जब इस तियोहार की बात आये तो हर भाई - बहेन के मुह से यही  गाना सुनने को मिलता है "'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना.... ! 

                 इस गीत को जब आप गुनगुनाते हैं तब दिल में एक अजीब-सी हलचल पैदा होती है। दिल कुछ अलग ही गुनगुनाने लगता है। लेकिन आज के युग में हर त्योहार का महत्व कुछ कम हो गया है। त्योहार मनते तो सभी हैं परंतु उसमें दिखावटीपन काफी हद तक बढ़ चुका है। फैशन के इस बढ़ते युग में त्योहार की कुछ खास कडि़याँ पीछे छूट जाती है।
                                 भागदौड़ भरी जिंदगी, फैशनेबल और स्टेट्‍ससिंबल का दिखावा बढ़ने के कारण ये त्योहार पुराने जमाने के रीति-रिवाजों को कहीं पी‍छे छोड़ आए हैं। अब जहाँ एक भाई राखी की डोर के बंधन को पूरी ईमानदारी से निभाता है। वहीं कई ऐसे भी हैं जो जरा-सी बोलचाल, जरा-सा झगड़ा होने पर एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करने के साथ-साथ मारपीट से लेकर मर्डर करने पर उतारू हो जाते हैं। 
जब बेटी की शादी होकर वह अपने मायके से ससुराल के लिए रवाना होती है तो उसे सबसे ज्यादा याद अपने भाई, माता-पिता की आती है। ऐसे समय जब राखी का त्योहार आता है तो बहन को सबसे ज्यादा अपने प्यारे भैया का इंतजार होता है। भैया जो कि उसका सखा भी होता है और सहेली भी।
           बचपन में अपने भाई के साथ बिताए गए वो दिन उस बहना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और यादगार साबित होते हैं। जब वह ससुराल में होती है। उसे भाई के द्वारा दिए गए उस रक्षा वचन का इंतजार उसे हमेशा रहता है। भाई के मायने बहुत बड़े पैमाने पर होते हैं। बहन चाहे नई नवेली दुल्हन हो या फिर सालों पहले उसकी शादी हो गई हो, भाई के रूप का महत्व तो हमेशा वैसा ही रह‍ता है। वह कभी कम या ज्यादा नहीं होता।
         इसलिए भाइयों को भी चाहिए कि समय भले ही कैसा भी हो, कितना भी बदल जाए लेकिन उसे उस डोर के वचन का रिश्ता हमेशा निभाना चाहिए। तभी सारी बहनें दिल से गुनगुना सकेंगी यह गीत 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना....' 'भैया मेरे छोटी बहेन को न  भुलाना .




दोस्ती के मायने.

                                              कहा जाता है की दोस्ती बर्फ के गोले के सामान होती है,
                                               जिसे पाना तो आसान होता है लिकिन उसे बनाये रखना,
                                                                       बहुत ही मुस्किल. 

अगसर ऐसा देखा गया है की दोस्ती सिर्फ लडको की ही समझी जाती है न की लड़कियों की , क्यूँ किया लडकियां रिश्ते निभाना नहीं जानती या लडको से बेहतर कर दिखाएंगी इस बात का डर रहता है .आपने तो देखा ही होगा की अगसर
ऐसा माना जाता है कि लड़कों की अपेक्षा में लड़कियों के बीच दोस्ती जरा कमजोर हुआ करती है। इसके पीछे बहुत सारे कारण हो सकते हैं जैसे लड़कियों में ईर्ष्या ज्यादा होती है, उन्हें सिर्फ गॉसिपिंग में मजा आता है, सीक्रेट्स छुपाने  में कमजोर हुआ करती हैं, कभी भी किसी से बात कर लेती है , कम लोग बुरे लगते है , सबकी मदद करना पसंद करती है , दोस्त की बात कब बुरी लगे ये पता नहीं चलता है आदि-आदि... लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। लड़कियाँ भी आपस में अच्छी दोस्त हुआ करती हैं। 

लड़के ये कहते जरा भी नहीं हिचकते कि लड़कियाँ आपस में बैठकर सिर्फ लड़-झगड़ सकती हैं। वे आपस में कभी भी अच्छी दोस्त नहीं होतीं जबकि ये सब बकवास है , जो लोगों के जहन में घर कर गया है। यदि ऐसा होता तो महिलाओं की दोस्ती की सूची में एक भी महिला शामिल न होती बल्कि उनकी सूची पुरुषों से भरी मिलती जबकि हकीकत यह है कि महिलाओं की छोटी-मोटी नोकझोंक भी उनके बीच दूरियाँ कम करने में सफल होती हैं। भविष्य में भी उनमें एक होने की संभावना बनी रहती है, जबकि पुरुष एक बार किसी को दुश्मन बना लें , तो वह कभी भी एक-दूसरे को पलटकर देखना तक पसंद नहीं करते।

महिलाओं के लिए हर रिश्ता अलग होता है, अनोखा होता है। वे सिर्फ उन्हें सँजोए रखने की कोशिश करती हैं। हालाँकि हम इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि महिलाओं का स्वभाव बातूनी होता है। इसलिए उन्हें गॉसिप्स करना सबसे अच्छा लगता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वे एक-दूसरे का साथ निभाने से जरा भी पीछे नहीं हटतीं। असल में महिलाओं में आपसी दोस्ती के मायने अलग होते हैं। किसी के लिए उसका सर्वस्व समर्पण होता है तो किसी के लिए उनके दिल में बहुत जगह होती है।

 अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है कि महिलाएँ आपस में बिलकुल भिन्ना होती हैं जिसका अंदाजा पुरुष लगा भी नहीं सकते। ऑफिशियल तौर पर अब इस बात की पुष्टि हो गई है कि महिलाओं की दुनिया में दोस्ती, त्याग, समझौता पुरुषों की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है। महिलाएँ एक-दूसरे को सपोर्ट करने के लिए, मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। इसके अलावा जब वे साथ होती हैं, तब उनमें हैप्पी हारमोंस बहुतायत में विकसित हो रहे होते हैं, महिलाएँ साथ लंच करें या साथ बैठकर गॉसिप्स करें। इन सभी कारणों से उनमें प्रोजेस्टेरोन हारमोन्स, मूड बदलने में सहायक हारमोन होता है, उसका शरीर में विकास होता है। इससे वे सभी तरोताजा हो जाती हैं।
लेकिन पुरुषों के मुँह में ताला लगाने के लिए  जरूरी है कि वैज्ञानिकों ने भी उनकी नजदीकियों की पुष्टि की है। इस बात का भी खुलासा हुआ है कि महिलाएँ अपनी सारी बातें पुरुष दोस्त को नहीं बता पातीं इसलिए जब वे आपस में बात करती हैं, चाहे वे बेस्ट फ्रेंड हों या फिर नॉर्मल फ्रेंड्स सबको राहत महसूस होती है, तनावमुक्त रहती हैं और समस्याओं को आसानी से सोल्व कर लेती हैं। इसकी कई वजहें हैं। शायद एक जैसी स्थिति से हर महिला गुजरती है, इसलिए वे एक-दूसरे को पुरुषों की तुलना में बेहतर जानती हैं। महिला स्थिति को भाँप लेती है, जबकि पुरुष को हर बात एक-एक कर बतानी पड़ती है।

 महिलाओं के लिए जहाँ दोस्ती भावनाओं और संवेदनाओं से जुड़ी होती है, वहीं वे एक-दूसरे से सिर्फ माँगती ही नहीं बल्कि देना भी जानती हैं। जबकि पुरुषों के लिए दोस्ती महज मौज-मस्ती तक ही सीमित होती है। आमतौर पर पुरुष मानते हैं कि महिलाओं को राजदार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उनके पेट में कोई बात नहीं पचती, लेकिन हकीकत यह है कि जरूरत पड़ने पर महिलाएँ एक-दूसरे के राज को हमेशा राज बनाए रख सकती हैं, जहाँ तक पुरुष कल्पना भी नहीं कर सकते।

इन सब का मतलब यह है की महिलाओं की दोस्ती किसी भी मायने में पुरुषों की दोस्ती से कम नहीं होती, बल्कि हम कह सकते हैं कि दोस्ती निभाने में महिलाएँ पुरुषों से एक कदम आगे ही होती हैं। इसलिए , कभी भी  महिलाओं की दोस्ती पर सवाल उठाने से पहले एक बार सोचिएगा जरूर, क्योंकि ये एक-दूसरे के लिए हमेशा ख़ास होती हैं।

कहता है पापा का दिल.


माँ जो प्यार देती है उसका तो कोई मोल नहीं पर पापा के प्यार को हमने अब तक जाना नहीं , है दिल भी उनके पास ये क्यूँ हमने पहचाना नहीं माँ की जगह पापा ही  है जो देते हमको सारी खुशी , उनके होने से ही तो जीते है अच्छी जिन्दगी , और उनके होने से ही देखते है दुनिया सारी , पापा का दिल भी कोमल है क्यूँ आज तक सोचा नहीं माँ की ममता है जरुरी तो पापा का भी नाम जरुरी . बिन बोले वो समज जाते, चाहते हम किया है, सपने जो हम देख लेते है उन्हें पूरा करते माँ-पाप है , आँखे मेरी खुल गई पापा का प्यार नजर आया ममता के प्यार को आज मैंने पापा के दिल मैं भी पाया .

                                            माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
                                           ’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !            
                                            मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेट रखे हैँ,
                                             मिले तुम्हे सारी खुशी वो अरमान बनाये रखे है ,

है  मेरी ये ज़िम्मेदारी उदास कोई घर में न हो,
 तकलीफेँ सारी में झेलूँ और तुम सब बस खुश रहो,
खुशियाँ सारी तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
लोरिया का समय काम में देकर, भविष्य को तेरे आसा बनाता रहा  

                                                हैँ समाज का नियम कुछ ऐसा, पिता सदा गम्भीर रहे,
                                                 मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, पर आँखो से नीर न बहे!
                                              भूला नही मुझे हैँ याद अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
                                                     पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,

कन्धोँ पे वो बैठ के उसका यहाँ वहां संग मेरे घूमना
होली और दीवाली पर भी पैसे लेने में झिझकना
माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो आंसू आँख मे थम जाना,
                                                 माँ जैसा है प्यार दिल में , दीखाने की झमता नहीं
                                               भोली सूरत देख कर , मन मेरा भी उदास होता है सही 

अब जो तुम हो गए हो बड़े तो , प्यार मैं भी दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ मैं भी , तुमको ये बतलाऊंगा,
कुछ देर बैठ कर तू चला गया , बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ यह, कह कर,  खुद को समझाऊंगा!

नन्ही कली.

ये नन्ही कली आती है जब अपनी बगिया में, और आकर भर देती है ,जो खुशियाँ सारे परिवार में, जिनके होने से होती है हर मंजिल आसान , जिनकी बातों में होती है प्यारी से मुस्कान, है वो कली अपने यहाँ तो उसको भी मिलकर दे सारा सम्मान -      

मेरी बगिया की नन्ही कली
 जिससे महकेगी हर एक गली,

ये प्यारा सा उपवन भी खिल जाएगा
जब कली को न्या रूप मिल जाएगा,

बिखरेगी अपनी वो सुन्दरता
जब झलकेगी उसकी कोमलता,

तब बहारों को मिल जाएगी रागिनी
मेरी नन्ही कली को भी अपनी संगिनी,


 आंगन मे मेरे खुशबू फैलाएगी
फूल बन के सदा महकाएगी ,


जब नन्ही कली फूल बन जाएगी
अपनी खुशबू से सब को महकाएगी,


              उसकी खुशबू के होंगे सब दीवाने
                  सभी होंगे अपने , न की बेगाना,


                             उसके हँसने से हँसेंगे सभी
                                बातों से उसकी मजे लेंगे सभी ,


                                          आने न देंगे आँखों मैं उसके आसूं 
                                                प्यार इतना हर पल उसे देंगे,
 
                                                       मेरी बगिया की नन्ही कली
                                                            जिससे महकेगी हर एक गली!!

Friday, 13 April 2012

corruption in India.

                                                                                                     What exactly is corruption?

Corruption is defined as moral depravity and influencing through bribery. Essentially, corruption is the abuse of trust in the interest of private gain. And it can be divided into five broad types: trans active, extortive, defensive, investive and nepotistic. 

 The trans-active type refers to the mutual agreement between donor and recipient to the advantage of, and actively pursued by, both parties. This normally involves business man and government. 

The extortive type is the kind where the donor is compelled to bribe in order to avoid harm being inflicted upon his person or his interest.

Defensive corruption is the behaviour of the victim of extortive corruption. His corruption is in self-defense. 

Investive corruption involves the offer of goods or services without any direct link to a particular favour but in anticipation of future occasions when the favour will be required. 

 Nepotistic corruption, or nepotism, is the unjustified appointment of relatives or friends to public office, or according them favoured treatment, in pecuniary or other forms, violating the norms and the rules of the organisation.

The constituent elements of corruption are cheating and stealing. Where corruption takes the extortive form, it is stealing by force through compulsion of the victim. Where it concerns bribing a functionary, the latter is involved in theft. No society or culture condones stealing and cheating, actually all cultures condemn these activities.

Condemnation of bribery, of greed, of misappropriation of property has accompanied Hindu thought throughout the ages and yet corruption is deep-rooted in India today.

It is not difficult to locate the causes of corruption. Corruption breeds at the top and then gradually filters down to the lower levels. Gone are the days when people who joined politics were imbued with the spirit of serving the nation. Those who plunged themselves into the fight for freedom knew that there were only sacrifices to be made, no return was expected. 

So only the selfless people came forward. But the modern politicians are of entirely different mould. They are not motivated by any lofty ideals. They win elections at a huge personal cost and then try to make the best of the opportunity they get. Powerful business magnates who are forced to give huge donations to political parties indulge in corrupt practices not only to make up their losses but also to consolidate their gains.

When people in power indulge in corruption so unabashedly, the common man gets a kind of sanction. Ironically, instead of fighting against the menace of corruption, our political leaders declare it a worldwide phenomenon and accept it as something inevitable.

The main point made by the Human Development Report is about: his special nature of corruption in India. Corruption in our country has: our key characteristics that make it far more damaging than corruption mother parts of the world.

First, corruption in India occurs upstream, not downstream. Corruption at the top distorts fundamental decisions about development priorities, policies and projects. In industrial countries, these core decisions are taken through transparent competition and on merit, even though petty corruption may occur downstream.

Second, corruption money in India has wings, not wheels. Most of the corrupt gains made in the region are immediately smuggled out to safe made in the region are immediately smuggled out to safe havens abroad. While there is some capital flight in other countries as well, a greater proportion of corruption money is actually ploughed back into domestic production and investment. In other words, it is more likely that corruption money is used to finance business than to fill foreign accounts.

Third, corruption in India occurs with 345 million people in poverty. While corruption in rich, rapidly growing countries may be tolerable though reprehensible, in poverty stricken South Asia, it is appalling that the majority of the population cannot meet their basic needs while a few make fortunes through corruption.

Info tech can be a prime weapon against corruption. Information technology is making its presence felt in India. Therefore, India is not only a corrupt country; it is also a country which is hoping to emerge as an Info tech superpower or a software superpower. The interesting point for consideration therefore is that can Info tech be used to help India become economic superpowers by checking corruption?

To understand this, we must first understand the dynamics of corruption and the dynamics of Info tech. So far as the dynamics of corruption are concerned, it is obvious that corruption flourishes in our country because of the following five reasons:
(i) Scarcity of goods and services.  (ii) Lack of transparency.  (iii) Complicated rules and red tape, which encourage corruption although 'speed' money.  (iv) Legal cushions safety created for the corrupt under the healthy assumption that everybody is innocent till proved guilty.  (v)Tribalism or biradari between the corrupt.

It is therefore logical that if we can tackle each of the five cause of corruption, we should be able to check the malaise to that extent. Information technology can help us to tackle these causes of corruption.

According to credit bank's guidelines, electronic clearance systems have been introduced at the metros for corporate clients. But the lack of proper reconciliation on a daily basis has facilitated the perpetration of massive fraud. Again, software that enables daily reconciliation can be used to detect fraud early.
As regards advances in credit-related fraud, it would help if banks computerised the database of parties enjoying credit facilities from different banks to avoid double financing. A database on fraudsters and willful defaulters with photographs will help the banking system protect itself.

Info tech also ensures that the files are never lost, thus rendering the paper trial inerasable. This can be done by scanning and storing of confidential files. Of course, this will also means that cyber laws have to come into effect. Database need to be computerised. The National Crime Records Bureau, for example has got data about corrupt elements and their modus operandi. By using computerised search options rather than shifting the database manually, the police can help to bring the corrupt to book more effectively and speedily.

These are some ideas about how information technology can help to fight corruption. What India needs is a greater display of imagination are locating the causes for corruption and seeing how, in each area, Info tech can help.






Thursday, 12 April 2012

जिन्दगी का मेला.


जिन्दगी के मेले कभी कम न होंगे अफ़सोस अब हमे न होंगे, जी हाँ यह बात बिल्कुल सही है कि हमने जब से इस दुनिया में जन्म लिया तभी से यह मेला भी शुरू हुआ और जब हम सब रुक जाएँगे तभी इस मेले का रुकना संभव है उससे पहले नहीं.
                             हम सब जानते है कि जिन्दगी एक सफ़र है सुहाना और इस सुहाने सफ़र का हम सब मजा ले रहे है पर फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ इस सफ़र का आनंद ले रहे है तो कुछ भगवन से अपना सफ़र जल्दी ख़त्म करने की दुआ मांग रहे है, जो इंसान अपनी जिन्दगी ख़ुशी से जी रहे है जिन्हें अपनी जरा भी परवाह नहीं, 
           

 वही जिन्दगी का मेला खुशी से घूम पाता है और जो इंसान हर वक्त बस दुनिया दारी की बातो में उलझा रहता है वो कभी इस दुनिया को और उसके मेले का आनंद नहीं उठा पाता क्यूंकि हर वक्त वो अहंकार नामक रष के चंगुल में ही फसा रहता है  और, इस अहंकार के जाल से यह व्यक्ति कभी अपना पीछा छुड़ा नहीं सकता यह लोग बस यही सोचते रहते है की  मेरा परिवार, मेरा पति, मेरा बच्चा, मेरा घर, यह लोभी लोगो का काम है और लोभी कभी कहीं संतुष्ट नहीं रह सकते, ईसाई देवता का मानना है की आकाश में उड़ते हुए उन पक्षियों को देखो जिन्हें चिंता नहीं की वो क्या खाएँ, क्या पहने , कहाँ रहे, पर  इश्वर उन पर सदा अपनी कृपा
बनाये  रखता है और उन परिंदों को किसी  की कोई परवाह नहीं इसीलिए वो अपनी जिन्दगी  के मेले का आनंद लेते है और हम इंसान बस यही सोचते रहते है की आज हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं , आज हम कहाँ रहे बस यही कारन है की हम इस सुन्दर सफ़र का आनंद नहीं ले पाते, इसलिए हमे भी उन परिंदों की तरह अपनी डोर उस उपर वाले के हाथ में ही छोड़ देनी चाहिए. और अपनी जिंदगी को खुशी से जीते जाना चाहिए साथ ही साथ हर मुश्किल का सामना बड़े ही सोच समझ कर करना चाहिए , ऐसा करने से शायद हम भी जिन्दगी के मेले को देख पायेंगे.
                                         

Tree is like as a mother,,,,So Save the Tree.

    Tree is like as a mother,,,,So Save the Tree.

पेड़ लगे मैदानों में ,
बस्ती में, सुनसानो में
घर के भीतर आगन में,
खेतो में ,बन -उपबन में

हमारे देश में हरियाली का महत्व कम होता जा रहा है क्यूँ की आज लोग पेड़ो को लगाने की बजह उन्हे काटने में लगे है ,  जबकि पेड़  हमारे जीवन को बचाता है, सोचो यदि धीरे-धीरे सारे पेड़ काट दिए जायेंगे तो हमारा जीवन  भी जल्द ही ख़त्म हो जाएगा इस लिए हमे अपने सुन्दर धरोवर को युही बनाये रखने का जादा से जादा प्रयास करना चाहिए क्यूँ की भविष्य में यही हमारे जीवन की सुरक्षा में महतवपूर्ण योगदान देगा.  मेरा कहना है तुमसे सिर्फ इतना - "हे मानव इन वृक्षों पर तुम मत करो संहार , है वृक्ष धरा का गहना जो करता तुम पर उपकार , करता तुम पर उपकार यह -करता तुम पर उपकार , रोटी, कपडा, और मकान पर भी इसका अधिकार , तो क्यों करते हो नाश उसका जो देता है जीवनदान और पृथ्वी की सुन्दरता पर क्यूँ लगाते हो निशान, मत करो संहार मानव , मत करो संहार , है वृक्ष धरा का कहना जो करता तुम पर उपकार." आप के जीवन के लिए सासें जरुरी है जिनके लिए वृक्ष लगाना जरुरी है, हम लोग वृक्षों से बहुत उम्मीद रखते है पर वृक्ष हम से क्या चाहते है सिर्फ इतना की हमे  उनकी संख्या को बढाना है , तभी तो कहा है की ये -

ये देते है मीठे फल
                               छाया भी देते शीतल
देते शुद्ध हवा ,जीबन
                             जड़ी -बूटियाँ और ईधन
पेड़ो से वर्षा होती
                           पेड़ो से हरियाली है
जीबन है ,खुशहाली है
                              पेड़ न अब कटने देंगे
बन न जरा घटने देंगे
                                     सब मिल पेड़ लगाएँगे
हरियाली  फैलाएँगे !!      






Wednesday, 11 April 2012

वक्त का सिलसिला.

यह वक्त का सिलसिला चलता ही जा रहा
       हर एक मोड़ पर कुछ नया सिखा रहा 

                     यह समय का चक्र ही तो है 
                                 जो रुकने का नाम नहीं ले रहा 

  कभी किसी की आँखों में आंसू 
          तो कभी होटों पर हसी है  भर रहा 

एक साथ हजारो खुशी तो 
एक साथ  कुछ गम भी ये दे रहा 

     वक्त का एहसास उनको होता है 
         जो वक्त की नजाकत को समझते है

               ये वक्त जब निकल जाता है 
                   तो बाद में पछताते जाते हैं

        हमारी बातें हमारे वक्त को बयाँ नहीं करती 
             वो वक्त ही है जो बातों को बयाँ कर देता है 

                         यही तो है वक्त का सिलसिला                 
                  जो वक्त आते ही सारे राज खोल देता है !!





MERA SAPNA, TERI TARAKKI

है आँखों में एक प्यारा सपना
छूले तू आसमान अपना, 
                                                                       
          जो भी सपना देखा तुने
           कर ले तू उनको अब पूरा,

नहीं जरुरत इस सफर में
किसी और की तेरे सपनों में, 

             कुछ पल प्यार को भूल कर
            पहचान अपनी बना तू टट कर,

                    तरक्की तुझे करनी है तो
                    प्यार को आड़े मत आने दे

                                                                     बिन तेरे, मैं कुछ नहीं
                                                                       इस बात को अब तू जाने दे 
                                                                  
                                                                         चाहती नहीं दूर रहना तुझसे
          मज़बूरी ये मेरी है

                            इस पल तो दुरी ही सही
                                  आगे साथ जरुरी है

                                         इस पल सब भूल जा
                                          तरक्की के रस्ते पर चलता जा

    चाहती नहीं दूर रहना तुझसे
                                                             मज़बूरी ये मेरी है

  इस पल तो दुरी ही सही
   आगे साथ जरुरी है

                 इस पल सब भूल जा
                 तरक्की के रस्ते पर चलता जा

        जिस पल साथी पूछे तेरा
     उस पल तक कुछ बन जा

मानती हूँ सफर है बहुत ही मुश्किल
पर सफर को तय करना है जरुरी

     बिना किसी के साथ के
      तुझे बढना है जरुरी

            हूँ हर दम साथ तेरे 
             कहने से ये बात डरती हूँ

                       दे रही हूँ तुझे जो तकलीफे
         खुद भी ढंग से जीती नहीं हूँ

                                                किसी से मतलब है नहीं
                                                 तुझे परिवार का सामना करना है

मेरा सपना, तेरी तरक्की
      अब जल्द ही पूरा करना है 
                तेरी बातों को याद करके हँस लेती हूँ मैं 
                       बीते हुए उन पलों को याद करके जी लेती हूँ मैं 
                               भुलाना तुझे आसान नहीं पर
                                        दिखाने के लिए भूल जाती हूँ मैं 
                                                 रुकना है जरुरी, सब्र करना है जरुरी 
                                                          है मेरा दिल पत्थर,  दिखाना है जरुरी

                                                      मेरा सपना, तेरी तरक्की
                                                 अब जल्द पूरा करना  है जरुरी !!

           
                  
 

अजीब सी उलझन.

न जाने कौन सा ये भवर है
मुझे उलझाता जा रहा आज-कल है,
               
                  उलझनों को सुलझाने की बजह       
                   भटकाता जा रहा आज-कल है,
सोच की गहराइयों में खो गई हूँ मैं 
बहार निकलने का रास्ता भी भूल गई हूँ मैं,
                   अब तो ये उलझन बढती जा रही है 
                   दिल, दिमाग को सताती जा रही है,

है ये उलझन किस कारण से 
 ये भी समझ नहीं आता है
                   सुलझाने की बात तो दूर 
                   उलझन मैं उलझता जा रहा है
क्या बात है ऐसी पता नहीं 
जो इतना सताती जा रही है
                 
                 दिन को हफ्ते, हफ्ते को महीने मैं 
                   जो यूँ ही बदलती जा रही है

 थक चूका है दिमाग भी 
  सोचना कुछ चाहता नहीं है,

                    तकलीफ इससे जादा अब 
                         ये भी लेना चाहता नहीं,

                                   क्यूँ की उलझन मैं दिल-दिमाग भी उलझता जा रहा दिन रात है 
                                     गुस्सा इतना बड़ गया है कि भूल गया उलझन की ही बात है!!     

Tuesday, 10 April 2012

SAVE GIRL CHILD

                                        "  बिन तेरे नहीं हरियाली, जिन्दगी की यही बात निराली ".

कहने को तो इस देश में लोग अक्सर बड़ी-बड़ी बात करने में पीछे नहीं हटते. फिर चाहे वो बात समाज सेवा की हो या किसी और की.  पर जब भी लड़का या लड़की की बात आती है तो न जाने क्यूँ वो सोचने लग जाते है, न जाने क्यूँ लड़के का नाम सुनते ही वो खुश हो जाते है और लड़की का नाम सुनते ही उदास. क्या सिर्फ लड़का ही सब कुछ होता है लड़की कुछ नहीं होती, क्यूँ एक परिवार का वंश लड़के से ही चलता है जबकि लड़की भी तो उसी परिवार की है तो उससे क्यूँ नहीं चल सकता.
                                                           
   लड़की जो बहुत समझदार, सहनशील, होती है वो सबको एक साथ एक ही धागे  में जोड़ कर रखती है फिर क्यूँ इतना भेद भाव करते है हम लोग, जिस तरह गाडी एक पइये पे नहीं चल सकती ढीक उसी तरह बिन लड़की के ये दुनिया नहीं चल सकती.
                                                                                                  
   वो लड़की जिससे परिवार की इज्जत होती है तो क्या उससे परिवार की शान नहीं हो सकती, क्या उसके संस्कार से परिवार की पहचान नहीं हो सकती, क्या वो अपने परिवार का गुरुर नहीं बन सकती.  बन सकती है लेकिन उसके लिए हमे  पहल करनी होगी हमे अपनी सोच बदलनी होगी और लड़के से भी जादा महत्तव लड़की को देना होगा आज हमारे देश में लड़की भी हर काम करने की हिम्मत रखती है,  हमे सिर्फ उनका साथ देना है न की उन्हें इस संसार में आने से रोकना है,   ऐसा करने से हमारा परिवार के साथ हमारे देश का भी विकास होगा. तो आइये-
                                  
                                            देश के विकास के लिए हमे हाथ बढाना है 
                                            लड़कियों की संख्या को लडको के बरावर लाना है!!                
                                                     
                                                
                                         
                                           
                                              
                                                                
                         
                                                               

Monday, 9 April 2012

श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह एक महानअभिवियक्ति

म सब विकास चाहते है , अपना भी और अपने आस पास का भी , और इसी बात को ध्यान रखकर हम अपने नेता का चुनाव करते है और उम्मीद रखते है की शायद यही वो इंसान हो जो हमारा उद्धार  कर सके, हमारी जरूरतों को पूरा कर सके पर क्या इन नेता रूपी समाज सेवको से यह उम्मीद लगाना उचित है क्यूँ की अगर ये लोग हमारी जरूरतें पूरी करेंगे तो इनकी जरूरतें कोंन पूरी करेगा , इन्हें समाज सेवा शोभा नहीं देता , इन्हें शोभा देता है इनकी ढगी , अहसान फरामोशी , लालच और स्वार्थ ही इन्हें शोभा देता है और यही सब करना इन्हें ख़ुशी  देता है .
        इन्ही सब के बीच में एक महान , साधारण और सझम वियक्ति भी है जिन्हें केवल एक ही चीज सुनाई देती है और एक ही चीज देखाई देती है और वो है " सेवा " वह वियक्ति है श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह जो सिर्फ सेवा के लिए ही जीवत है इनका एक ही उद्देश्य है  निस्वार्ध मन से सेवा और सिर्फ सेवा यह वो शख्स है जिन्होंने पूरा जीवन केवल धरती माँ की सेवा में लगा दिया इनका कहना है की जल ही जीवन है धरती हमारी माता है और हम सब उस माँ की गोद में बैठे है और इस माँ की सेवा और इस माँ की रक्षा ही इनका सबसे बड़ा कर्त्तव्य है और इस कर्त्तव्य को भली भांति निभा रहे है.
                                           
                                        "इस महान शक्स ने 6  अगस्त 1959 को उ.प  के बागवत जिले के दोला गाँव में जन्म लेकर पुरे गाँव को अपनी रोशनी से जगमग किया , इन्होने एक राजपूत परिवार में जन्म लिया और जमींदारी इनका पेशा था , यह अपने सात भाई बहीनो में सबसे बड़े थे ,इनके पिता एक जमींदार थे जिनके ऊपर ६० एकड़  जमीन की देख रेख करने की जिमेदारी थी ,  इनके लिया बहुत बड़ा दिन था जब श्री राकेश शर्मा जी इनके घर आये और एक वयस्क राजेंद्र सिंह की सोच को बाहर निकाला और तभी से राजेंद्र सिंह गाँव के विकास में शर्मा जी की मदद करने लगे , श्री राजेंद्र  जी ऐसे दिग्गज इंसान है जिन्होंने अपने कदम लगातार आगे की ओर बढाये.
                                            श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह जी को वाटर मैंन ऑफ़ इंडिया कहा जाता है क्यूँ की इन्होने हमारे भारत में पानी को सुरक्षित करने के लिए बहुत सारी योजनाये बनाई  और उसमे बहुत काम किया है इन्होने 2001 में एक समुदाय के नेतृत्व  के लिए जल संचयन और जल प्रबंधन का प्रयास किया  जिसके लिए इन्हें रोमन मैंग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया , 1975 से यह एक गैर सरकारी संगठन  चला रहे है जिसका नाम है तरुण भारत सिंह जिसकी सहायता से वह रेगिस्तान जैसे इलाको में जाकर छोटे छोटे डैम का निर्माण कर जल को सुरक्षित रखने का काम करते है . तरुण भारत सिंह संगठन की मदद से इन्होने ८६०० जोहाड़ का निर्माण क्या जो जल सुरक्षित संरचना है और जिसका प्रयोग हम शुष्क मुसम मैं पानी इकट्टा   करने के लिए करते है .
                       गाँव मैं पानी के कभी कमी न हो इसलिए इन्होने बहुत नहर, तालाब और डैम का पुनः  निर्माण करवाया .
            गंगा अभियान मैं जोरो सोरों से लगे सदस्यों मैं से एक है श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह जी जिन्होंने नेशनल गंगा रिवर वेसन अथोरिटी जो सन २००९ मैं स्थापित की गई उसके साथ मिलकर गंगा को बचाने का प्रयास निरंतर कर रहे है ;
         श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह जी बहुत ही सरल और सरल ह्रदय के वियक्ति है वह जितने सरल है उतनी ही सरल  उनकी बोल चाल की भाषा ,क्यूँ की यही उनकी शक्ति है जिसके बल पर उन्होंने दूर दूर तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास किया और लोगो को अपनर विचार बड़े सुन्दर तरीके से वियक्त किये ,
   कुछ वर्ष पूर्ब दयालबाग शिक्षण संस्थान मैं  गैर सरकारी संगठन स्फीहा द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी हुई जिसमें बड़े बड़े दिग्गजों ने सिरकत की जिस मैं श्री राजेंद्र प्रसाद सिंह जी भी उपस्थीत थे , यहाँ इन्होने इतनी खूबसूरती से अपने विचार रखे की चारों ओर तालियौं की गूँज सुनाई देने लगी , कारन ये था की उन्होंने एक आम भाषा का सहारा लिया और उस आम जनता के सामने अपने विचार रखे उन्होंने कहा की हमारे गाँव मैं यह नहीं कहा जाता की हमारी धरती को भुमंडलिए करण से बचाना है बल्कि यहे कहा जाता है की हमारी धरती माँ को बुखार है जिस तरह एक वियक्ति को बुखार आ जाने पर वह चारपाई पकड़ लेता है और थकान महसूस करता है उसी तरह धरती माँ भी बीमार है जिनका इलाज जल्द होना चाहिए, यूँ  समय वर्वाद करके नहीं वल्कि हम सबको मिल कर एक समूह मैं अपने कदम आगे बढाने होंगे यूँ संगोष्ठी करके ओपर भाषण दे कर कुछ हासिल नहीं  होगा ,
यही वो महान वियक्ति है जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इस धरती माँ को समर्पित कर दिया और जल को  सुरक्षित रखने के लिए हेर सम्ब्हब प्रयास किया और लगातार कर रहे है . 
                                                    
         
                                               " स्वरुप , साधारण मानव जैसा 
                                                             माना जल जीवन जैसा 
                                                 न जाने कैसे सोचा ऐसा 
                                                           किया उन्होंने काम ही ऐसा 
               
                                                 जाकर हर गाँव , शहर , छेत्र . मोहल्ला 
                                                         दी जानकारी , करो धरती की सेवा 
                                                   दी पदवी धरती को , माँ की जैसी 
                                                              यही करती है रक्षा , साए के जैसी
                         
                                                 माँ की सेवा और जल की सुरक्षा
                                                         एक मात्र प्रसाद जी के जीवन की कक्षा 
                                                  बस इन्ही सब से रची इन्होने 
                                                          अपने जीवन की रचना !!















      
 

Saturday, 24 March 2012

एकला चौलो रे .

 August 2010 , 2nd year of graduation (3rd sem) in Dayalbagh Educational Institute, Agra.

मैं रेनू सिंह,  ग्रेजुएशन फस्ट  इयर की छुट्टियों के बाद सेकिंड इयर की पढाई के लिए कॉलेज पहुंची.  उस दिन हम सभी दोस्त मिले और खूब मस्ती की हम सब से बातें करते थे ,  हमारी क्लास बहुत अच्छी और एकसाथ रहेने वालो मे से थी.  पर बात तो ये भी सच है की  " वक़्त कब कैसा मोड़ दिखा दे ये हमे भी पता नहीं चलता. एसा ही कुछ मेरे साथ हुआ.
                                    सितम्बर में हमारे फस्ट टेस्ट शुरु हुए.  हम सभी दोस्त एक साथ एक ही लाइन में टेस्ट देने के लिए बैठ गए . मेरे पीछे मेरी एक दोस्त ( D.S ) बैठी फिर जब हमारा टेस्ट हमे मिला तो मुझे उस में कुछ भी नहीं आ रहा था इसलिए मेरी टेंशन बढ गई और उसी समय मेरे पीछे बैठी मेरी दोस्त ने मुझसे पूछा  रेनू  मुझे बता दे तो मैंने उसे मना कर दिया जब मुझे ही कुछ नहीं आता तो मैं  उसे किया बताती,  थोड़ी ही देर में हमारा टेस्ट ख़त्म हो गया और सभी दोस्त कमरे  से बाहर निकलने लगे जब में कमरे  से बाहर  निकली तो मेरे पूछने पर की टेस्ट कैसा हुआ है किसी ने भी मुझसे बात नहीं कि मुझे तो पता  ही नहीं चल रहा था कि हुआ क्या है मेरे दोस्त जो टेस्ट से पहेले मुझसे बातें कर रहे थे अब अचानक से उन्हें हुआ किया है इसी सोच में पहला दिन तो निकल गया लेकिन  जब दूसरा दिन आया तो उस दिन भी मुझसे कोई नहीं बोला में समझ गई कि जिस दोस्त को मैंने  टेस्ट में बताया नहीं था उसने ही सब को मुझसे बोलने के लिए मना कर दिया है .
       मेरे न बताने कि बजह से ये सब हुआ था पर मैं  अपने दोस्त को गलत भी तो नहीं बता सकती थी लेकिन इस बात को तो कोई समझ  ही नहीं रहा था.  क्लास में मैं जिस सीट पर बैठती उस सीट पर कोई नहीं बैठता था.  सब साथ खाना खाते  लेकिन  मैं अकेले ही खाती और  कभी नहीं भी खाती क्यूँ कि मैं बहुत ही अकेली हो गई थी मैं उन लोगो के बीच में मनो फस गई थी जब भी वो सभी हस्ते- खेलते मैं अकेले ही बैठकर अपनी कॉपी में से  पड़ती रहती.  हर शाम को जब मैं घर पहुँचती तो बहुत रोती,  और ये दिल कि बात मैं घर में भी नहीं बता सकती थी  क्यूँ कि पापा और घर के सभी लोगो को भी दर्द होगा इसलिए बंद कमरे  में बैठ कर घंटो रोती और यही दुआ करती कि सुबह न हो ताकि मैं कॉलेज जाने से बच जाउं  पर ये तो सिर्फ एक कल्पना ही थी ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन था . इस तरह वक़्त निकलता  गया और 6 महीने हो गये.  6 महीने निकलने के बाद जब हमारा ( 3rd sem ) रिजल्ट आया तो देखा कि पूरी  क्लास में  मेरे ही सबसे जादा  मार्क्स आये थे उस समय मैं बहुत खुश हुई.
        उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि दोस्त , रिश्ते , नातें ये कुछ नहीं है सफर में कब कोई साथ छोड़ दे ये पता ही नहीं चलता है इसलिए अकेले ही जीना है और अपने आप ही सब करना है . मुझे अब उन दोस्तों कि भी जरुरत नहीं थी क्यूँ कि मैंने अपनी पहचान बना ली है.  फिर एक दिन अचानक  4th  सेम में मुझसे मेरी एक दोस्त  ने बात की मुझे उससे बात करके अच्छा लग रहा था पर इतने महीनो से जो मैं अकेली थी तो मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था . धीरे-धीरे मुझसे सब बात करने लगे पर अभी भी वो लड़की मुझसे बात नहीं करती थी जिस की बजह से इतना कुछ हुआ.  फिर नये साल वाले दिन हम सब एक दुसरे को मुबारकवाद (विश ) कर रहे थे तो उसने मुझे भी विश किया पहेले तो मैं सोचने लगी की ये क्या हुआ पर  फिर सब नोर्मल सा लगने लगा क्यूँ कि वो समझ कई थी की जो हुआ वो गलत था .
               लेकिन  मुझे ये भी अच्छे से याद था कि यदि आज ये दोस्त  मेरे साथ है तो किस तरह से है, मैं इन सब में अपनी पढाई को नहीं भूलना चाहती क्यूँ की कही न कहीं  उसी की बजह से आज ये मेरे दोस्त बने इस तरह मैं सब के साथ भी रहने लगी और पढाई भी करने लगी फिर जब हम BHSC Honours में आये उस समय भी मैंने  पूरी मेहनत कि और उस में भी मैंने ही टॉप किया और फिर जो हुआ वो मेरे जीवन कि सबसे अच्छी और पहली उपलब्धि थी उन 6 महीनो की सबसे प्यारी उपलब्धि जो है  वो है मेरा  " मेडल ".
                                               जिस वक़्त मैं दयालबाघ  के प्रेसिडेंट से  मेडल ले रही थी उस वक़्त मैं उस लड़की का शुक्रिया कर रही थी क्यूँ की अगर वो एसा न करती तो आज मैं इस मेडल की भी हक़दार नहीं होती . और शायद मुझे अपने अंदर छुपी ये अच्छाई भी नजर नहीं आ पाती की मैं भी बहुत कुछ कर सकती हूँ .

MORAl ( सीख):- मैंने अपने उन दिनों से ये शिखा की जिन्दगी मैं हमेशा अकेले ही चलना चाहिए क्यूँ की कब कौन साथ छोड़ दे ये हमे पता ही नहीं चलता इसलिए:-
                                  साथ तुम सबका दो पर
                                  खुद एकला ही चोलो .
और :-
                                  एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे sssssss
                                  ज़िन्दगी का सफर साथी एकला चोलो रे
                                  हो कोई भी डगर साथी
                                  एकला चोलो रे !