ऐसा क्यूँ होता है की लड़की के पैदा होने पर घर में मातम सा छा जाता है , पर उसी लड़की की विदाई पर घर में ढोल -नगाड़े बज उठते है ,लड़की का इस समाज में क्या कोई दर्जा है? कोई इज्जत है? हम सब बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते है? महिला सशक्तिकरण की बाते करते है, लेकिन यह सब कुछ देखने और सुनने मात्र का ही है , सब कहते है की शादी बिना दहेज़ की करो पर मै आप से पूछना चाहती हूँ की क्या यह संभव हो पाया है नहीं, और शायद ही कभी हो पायेगा क्यूंकि हमारे समाज में दहेज़ के लालची कम होने के बजाई बड़ते जा रहे है एक माता -पिता का बस एक ही सपना होता है , की उनकी बेटी एक सुखी घर जाकर अपना पूरा जीवन ख़ुशी से जिए और इसी ख़ुशी के लिए वो अपना सब कुछ बेटी को दहेज़ के रूप में देते है पर यह लाड , यह त्याग लड़के वाले क्या जाने ,यह प्यार भी उन्हे सौदा नजर आता है तभी तो दिन बा दिन नए सामान , गहने , आभूषण की मांग की जाती रहती है ऐसे भूखे लालची लोगो के लिए मै यह कहना चाहूंगी "की तुम इतने खुशकिस्मत हो की एक पिता अपनी लाडली अपनी जिन्दगी ,बिना सोचे समझे तुम्हारी जिम्मेदारी समझकर सोंपता है और तुम उसके साथ कैसा सलूख करते हो , दहेज़ मांगने से पहले यह सोचो की जो दहेज़ दूसरो से माँगा जा रहा है ,वो खुद के खरीदने की औकात नहीं है इसलिए दूसरों से भीख मांग रहे हो ,
शादी के दिन लड़की वाले क्यूँ सर झुका कर सबका स्वागत करे , अरे धन्यवाद और स्वागत तो लड़की वालो का होना चाहिए ,जिन्होंने इतना सुन्दर इंतजाम किया , तुम्हारा पेट भरा और अपनी बेटी दी ..
मेरी उन सभी लड़की वालो से विनती है की प्लीज़ अपने आप को झुकने मत दो , क्यूंकि आप सम्मान के भागीदार है आप को गर्व से खड़े होकर कहना चाहिए की यह मेरा दिया मेरी बेटी को प्यार से दिया तोहफा है पेट भरने के लिए दहेज़ नहीं, क्यूंकि मै अपने घर का सबसे अनमोल गहना , रुपया दे रहा हूँ वो है मेरी बेटी ,
क्यूंकि दुल्हन ही दहेज़ है ..................
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