Monday, 16 April 2012

पिता का त्याग.

इस समाज में एक लड़की का क्या दर्जा है देवी का , गायत्री का, सरस्वती का, नहीं , यह पवित्र नाम अब केबल नाम ही रह गए है . अब आप सब को मैं बताती हूँ की आखिर हमारे समाज में एक लड़की का क्या दर्जा रह गया है , इस समाज मैं लड़की का एक ही दर्जा है और वो है 'सौदा' , जी हाँ इसमें चोकने वाली कोई बात नहीं , क्यूँ की यह पड़ने में सुनने में कितना भी अजीब लगे परन्तु सच यही है की अब लड़की का सिर्फ सौदा ही होता है .
  क्यूँ की एक बाबुल की बेटी का रूप चाहे कैसा भी हो पर वो अपने बाबुल की लाडली ही होती है और जब उस लाडली की शादी का समय आता है तब उस्सका सौदा होता है और वो यह की आप हमे बस इतने पैसे दे दे दो हम सब देख लेंगे ,और जब लड़के वालो को लगता है की यह लोग हमारे standard के नहीं है तो वो लड़की से रिश्ता तोड़ने की बात करता है और रिश्ता टूट जाने के डर से पिता अपनी हैसियत  भूल कर कर्ज लेकर अपनी बेटी विदा करता है और बेटी के जाने के बाद उस लड़की के मायके का रंग ही उद्द जाता है

                      जिन्दगी का सबसे बड़ा त्याग है एक पिता का ,
                                                               की रंग बेटी की जिन्दगी में है भरना ,
                      यही एक मात्र उनका अपना सपना ,
                                                     
                                                  भविष्य में क्या होगा हमरा इसकी परवाह नहीं ,
                     वर्तमान में रहे खुश बेटी हमारी सपना यही ,

                                                            लेकर कर्ज ही चाहे करनी पड़े विदाई ,
                      कोई गम नहीं इसका बेटी हुई पराई,

                                      ख़ुशी इतनी होती है की मेरी लाडली का घर बस गया ,

                                 अब चाहे मौत भी आ जाय इसका कोई डर नहीं !!!!  
                                                                     

Importance of Education for Girl Child.

Education is every child's basic right and forms the crux of societal and individual development. As a country identified with the lowest literacy levels for women and girls, education for the girl child becomes crucial to women empowerment and development. More often than not, it is women from the rural backdrops of the country that are subjected to lack of education and thus, lack of opportunities. Even for those with access to education, the quality of rural education leads them nowhere. This makes it imperative for important steps towards access to quality education for the girl child and the underprivileged children.

Rights based, equal-opportunities education, particularly education for the girl child, acts as the primary vehicle which works to lift them out of poverty and obtain the means to participate in their communities by being well-informed and good decision makers. The global community and the world bodies like the United Nations time and again underline the need to focus on urgent national and international step to be taken for ensuring educational for the girl child. Hundreds of millions of young children, mostly girls,  

throughout the world are often deprived of education along with other essential needs like adequate food, clothing and health care. Going by these yardsticks, the development of a Nation is truly measured by many indicators and among them literacy levels especially of women and girl children are vital. 

The literacy drive among the girl child would work as a catalyst for social uplift and there by ensure National progress . Keeping this as the desired endeayour, eradication of illiteracy and bringing the girl child into the realm of education has been a major National concern for last so many decades. Here, it would be only relevant to point to a puplication by the Directorate of Adult Education a, few years back where in a compendium 'Literacy in India' carried a cover page showing a young village girl holding the slate inscribed on it words, "अब मैं लिख सकती हूँ ". The picture-story only rightly emphasizes on the importance of education for girl child and how gender inequity in literacy drive continues to remain a serious challenge.Female education and the literacy drive have given the girl child the much - needed respect she has been striving . The real success story has been that it has mobilized people to think and to express themselves. The demand for a closer involvement between literacy and skill development training has also emerged.









Sunday, 15 April 2012

दुल्हन ही दहेज़ है.

ऐसा क्यूँ होता है की लड़की के पैदा होने पर घर में मातम सा छा जाता है , पर उसी लड़की की विदाई पर घर में ढोल -नगाड़े बज उठते  है ,लड़की का इस समाज में क्या कोई दर्जा है?  कोई इज्जत है?  हम सब बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते है?  महिला सशक्तिकरण की बाते करते है, लेकिन यह सब कुछ देखने और सुनने मात्र का ही है , सब कहते है की शादी बिना दहेज़ की करो पर मै आप से पूछना चाहती हूँ की क्या यह संभव हो पाया है नहीं, और शायद ही कभी हो पायेगा क्यूंकि  हमारे समाज में दहेज़ के लालची कम होने के बजाई बड़ते जा रहे है एक माता -पिता का बस एक ही सपना होता है , की उनकी बेटी एक सुखी घर जाकर अपना पूरा जीवन ख़ुशी से जिए और इसी ख़ुशी के लिए वो अपना सब कुछ बेटी को दहेज़ के रूप में देते है पर यह लाड , यह त्याग लड़के वाले क्या जाने ,यह प्यार भी उन्हे सौदा नजर आता है तभी तो दिन बा दिन नए सामान , गहने , आभूषण की मांग की जाती रहती है ऐसे भूखे लालची लोगो के लिए मै यह कहना चाहूंगी  "की तुम इतने खुशकिस्मत हो की एक पिता अपनी लाडली अपनी जिन्दगी ,बिना सोचे समझे तुम्हारी जिम्मेदारी समझकर सोंपता है और तुम उसके साथ कैसा सलूख करते हो , दहेज़ मांगने से पहले यह सोचो की जो दहेज़ दूसरो से माँगा जा रहा है ,वो खुद के खरीदने की औकात नहीं है इसलिए दूसरों से भीख मांग रहे हो ,
                                                                          शादी के दिन लड़की वाले क्यूँ सर झुका कर सबका स्वागत करे , अरे धन्यवाद और स्वागत तो लड़की वालो का होना चाहिए ,जिन्होंने इतना सुन्दर इंतजाम किया , तुम्हारा पेट भरा और अपनी बेटी दी ..
मेरी उन सभी लड़की वालो से विनती है की प्लीज़ अपने आप को झुकने मत दो , क्यूंकि आप सम्मान के भागीदार है आप को गर्व से खड़े होकर कहना चाहिए की यह मेरा दिया मेरी बेटी को प्यार से दिया  तोहफा है पेट भरने के लिए दहेज़ नहीं, क्यूंकि मै अपने घर का सबसे अनमोल गहना , रुपया दे रहा हूँ वो है मेरी बेटी  ,
क्यूंकि दुल्हन ही दहेज़ है ..................

DOST.

            दोस्त तुम यादों में हो, वादों में हो, संवादों में हो
            गीतों में हो, ग़ज़लों में हो, ख़्वाबों में भी तुम ही तुम हो
चुप्पी में हो, खामोशी में हो, तन्हाई में हो
महफिल में हो, कहकसो  में हो और बेवफाई में भी तुम ही तुम हो
                         तुम उन चिट्ठियों में हो जो मैं तुम्हें दे न सका
                         तुम उस टीस में भी हो जो तुम मुझे देते रहे
 मैं उस मीठे दर्द को अल्फाजों में बदलता रहा
पर तुम ने उस दर्द का नाम ही यूँ बदल दिया 
                         नाराज होकर फेसबुक से अन्फ्रेंड कर दोगे तुम
                          डायरी से फाड़ कर , ग्रीटिंग्स कार्ड जला दोगे तुम
पर मेरी यादों से कैसे बच पाओगे बोलो तुम
चुप्पियाँ को मेरी अब कैसे सह पाओगे कहो  तुम

यादें और चुप्पियाँ एक-दूसरे की परछाई है तभी तो
चुप्पियाँ, यादों के समन्दर में डूबोती चली जाती हैं
            
                कहते है खामोशी पागल कर देती सब को है
                 शब्दों  का आना जरुरी है जो दिल को भर देती अब तो है

इसलिए शब्दों , आँसुओं का बाहर निकलना है जरुरी
मैं तो बाहर आ गया अब , तुम भी बाहर आ जाओ जल्दी

अब इस नाराजगी जो जल से तुम भी भूल जाओ
हो गई गलती मुझसे लो माफ़ी तुम ही दे जाओ

                                      इगो अब तुम छोड़ दो
                                  माफ़ी तुम भी मांग लो

फिर से एक बार सही दोस्ती को वो नाम दो
 दोस्ती सबसे प्यारी है , इसको अब पहचान दो  !! 

अनमोल भाई-बहेन का प्यार.

 हमारे देश  में ये रीत तो बहुत समय पहले से चली आ रही है , हर भाई और बहेन का ये अनमोल रिश्ता  हर छेत्र के कोनो कोनो  में मनाया जाता है आखिर क्यूँ नहीं मनाया जाए  चाहिए, ये त्यौहार है ही ऐसा  जो जिन्दगी भर की रक्षा करने का होता है हर भाई अपनी बहेन से और हर बहेन अपने भाई से यही  कहती की,  जिन्दगी में चाहे कुछ भी हो चाहे कैसे भी मोड़ आ जाये पर हम हमेशा साथ ही रहेंगे और एक दुसरे की  रक्षा करेंगे ,  और जब इस तियोहार की बात आये तो हर भाई - बहेन के मुह से यही  गाना सुनने को मिलता है "'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना.... ! 

                 इस गीत को जब आप गुनगुनाते हैं तब दिल में एक अजीब-सी हलचल पैदा होती है। दिल कुछ अलग ही गुनगुनाने लगता है। लेकिन आज के युग में हर त्योहार का महत्व कुछ कम हो गया है। त्योहार मनते तो सभी हैं परंतु उसमें दिखावटीपन काफी हद तक बढ़ चुका है। फैशन के इस बढ़ते युग में त्योहार की कुछ खास कडि़याँ पीछे छूट जाती है।
                                 भागदौड़ भरी जिंदगी, फैशनेबल और स्टेट्‍ससिंबल का दिखावा बढ़ने के कारण ये त्योहार पुराने जमाने के रीति-रिवाजों को कहीं पी‍छे छोड़ आए हैं। अब जहाँ एक भाई राखी की डोर के बंधन को पूरी ईमानदारी से निभाता है। वहीं कई ऐसे भी हैं जो जरा-सी बोलचाल, जरा-सा झगड़ा होने पर एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करने के साथ-साथ मारपीट से लेकर मर्डर करने पर उतारू हो जाते हैं। 
जब बेटी की शादी होकर वह अपने मायके से ससुराल के लिए रवाना होती है तो उसे सबसे ज्यादा याद अपने भाई, माता-पिता की आती है। ऐसे समय जब राखी का त्योहार आता है तो बहन को सबसे ज्यादा अपने प्यारे भैया का इंतजार होता है। भैया जो कि उसका सखा भी होता है और सहेली भी।
           बचपन में अपने भाई के साथ बिताए गए वो दिन उस बहना के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और यादगार साबित होते हैं। जब वह ससुराल में होती है। उसे भाई के द्वारा दिए गए उस रक्षा वचन का इंतजार उसे हमेशा रहता है। भाई के मायने बहुत बड़े पैमाने पर होते हैं। बहन चाहे नई नवेली दुल्हन हो या फिर सालों पहले उसकी शादी हो गई हो, भाई के रूप का महत्व तो हमेशा वैसा ही रह‍ता है। वह कभी कम या ज्यादा नहीं होता।
         इसलिए भाइयों को भी चाहिए कि समय भले ही कैसा भी हो, कितना भी बदल जाए लेकिन उसे उस डोर के वचन का रिश्ता हमेशा निभाना चाहिए। तभी सारी बहनें दिल से गुनगुना सकेंगी यह गीत 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना....' 'भैया मेरे छोटी बहेन को न  भुलाना .




दोस्ती के मायने.

                                              कहा जाता है की दोस्ती बर्फ के गोले के सामान होती है,
                                               जिसे पाना तो आसान होता है लिकिन उसे बनाये रखना,
                                                                       बहुत ही मुस्किल. 

अगसर ऐसा देखा गया है की दोस्ती सिर्फ लडको की ही समझी जाती है न की लड़कियों की , क्यूँ किया लडकियां रिश्ते निभाना नहीं जानती या लडको से बेहतर कर दिखाएंगी इस बात का डर रहता है .आपने तो देखा ही होगा की अगसर
ऐसा माना जाता है कि लड़कों की अपेक्षा में लड़कियों के बीच दोस्ती जरा कमजोर हुआ करती है। इसके पीछे बहुत सारे कारण हो सकते हैं जैसे लड़कियों में ईर्ष्या ज्यादा होती है, उन्हें सिर्फ गॉसिपिंग में मजा आता है, सीक्रेट्स छुपाने  में कमजोर हुआ करती हैं, कभी भी किसी से बात कर लेती है , कम लोग बुरे लगते है , सबकी मदद करना पसंद करती है , दोस्त की बात कब बुरी लगे ये पता नहीं चलता है आदि-आदि... लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। लड़कियाँ भी आपस में अच्छी दोस्त हुआ करती हैं। 

लड़के ये कहते जरा भी नहीं हिचकते कि लड़कियाँ आपस में बैठकर सिर्फ लड़-झगड़ सकती हैं। वे आपस में कभी भी अच्छी दोस्त नहीं होतीं जबकि ये सब बकवास है , जो लोगों के जहन में घर कर गया है। यदि ऐसा होता तो महिलाओं की दोस्ती की सूची में एक भी महिला शामिल न होती बल्कि उनकी सूची पुरुषों से भरी मिलती जबकि हकीकत यह है कि महिलाओं की छोटी-मोटी नोकझोंक भी उनके बीच दूरियाँ कम करने में सफल होती हैं। भविष्य में भी उनमें एक होने की संभावना बनी रहती है, जबकि पुरुष एक बार किसी को दुश्मन बना लें , तो वह कभी भी एक-दूसरे को पलटकर देखना तक पसंद नहीं करते।

महिलाओं के लिए हर रिश्ता अलग होता है, अनोखा होता है। वे सिर्फ उन्हें सँजोए रखने की कोशिश करती हैं। हालाँकि हम इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि महिलाओं का स्वभाव बातूनी होता है। इसलिए उन्हें गॉसिप्स करना सबसे अच्छा लगता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वे एक-दूसरे का साथ निभाने से जरा भी पीछे नहीं हटतीं। असल में महिलाओं में आपसी दोस्ती के मायने अलग होते हैं। किसी के लिए उसका सर्वस्व समर्पण होता है तो किसी के लिए उनके दिल में बहुत जगह होती है।

 अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है कि महिलाएँ आपस में बिलकुल भिन्ना होती हैं जिसका अंदाजा पुरुष लगा भी नहीं सकते। ऑफिशियल तौर पर अब इस बात की पुष्टि हो गई है कि महिलाओं की दुनिया में दोस्ती, त्याग, समझौता पुरुषों की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है। महिलाएँ एक-दूसरे को सपोर्ट करने के लिए, मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। इसके अलावा जब वे साथ होती हैं, तब उनमें हैप्पी हारमोंस बहुतायत में विकसित हो रहे होते हैं, महिलाएँ साथ लंच करें या साथ बैठकर गॉसिप्स करें। इन सभी कारणों से उनमें प्रोजेस्टेरोन हारमोन्स, मूड बदलने में सहायक हारमोन होता है, उसका शरीर में विकास होता है। इससे वे सभी तरोताजा हो जाती हैं।
लेकिन पुरुषों के मुँह में ताला लगाने के लिए  जरूरी है कि वैज्ञानिकों ने भी उनकी नजदीकियों की पुष्टि की है। इस बात का भी खुलासा हुआ है कि महिलाएँ अपनी सारी बातें पुरुष दोस्त को नहीं बता पातीं इसलिए जब वे आपस में बात करती हैं, चाहे वे बेस्ट फ्रेंड हों या फिर नॉर्मल फ्रेंड्स सबको राहत महसूस होती है, तनावमुक्त रहती हैं और समस्याओं को आसानी से सोल्व कर लेती हैं। इसकी कई वजहें हैं। शायद एक जैसी स्थिति से हर महिला गुजरती है, इसलिए वे एक-दूसरे को पुरुषों की तुलना में बेहतर जानती हैं। महिला स्थिति को भाँप लेती है, जबकि पुरुष को हर बात एक-एक कर बतानी पड़ती है।

 महिलाओं के लिए जहाँ दोस्ती भावनाओं और संवेदनाओं से जुड़ी होती है, वहीं वे एक-दूसरे से सिर्फ माँगती ही नहीं बल्कि देना भी जानती हैं। जबकि पुरुषों के लिए दोस्ती महज मौज-मस्ती तक ही सीमित होती है। आमतौर पर पुरुष मानते हैं कि महिलाओं को राजदार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उनके पेट में कोई बात नहीं पचती, लेकिन हकीकत यह है कि जरूरत पड़ने पर महिलाएँ एक-दूसरे के राज को हमेशा राज बनाए रख सकती हैं, जहाँ तक पुरुष कल्पना भी नहीं कर सकते।

इन सब का मतलब यह है की महिलाओं की दोस्ती किसी भी मायने में पुरुषों की दोस्ती से कम नहीं होती, बल्कि हम कह सकते हैं कि दोस्ती निभाने में महिलाएँ पुरुषों से एक कदम आगे ही होती हैं। इसलिए , कभी भी  महिलाओं की दोस्ती पर सवाल उठाने से पहले एक बार सोचिएगा जरूर, क्योंकि ये एक-दूसरे के लिए हमेशा ख़ास होती हैं।

कहता है पापा का दिल.


माँ जो प्यार देती है उसका तो कोई मोल नहीं पर पापा के प्यार को हमने अब तक जाना नहीं , है दिल भी उनके पास ये क्यूँ हमने पहचाना नहीं माँ की जगह पापा ही  है जो देते हमको सारी खुशी , उनके होने से ही तो जीते है अच्छी जिन्दगी , और उनके होने से ही देखते है दुनिया सारी , पापा का दिल भी कोमल है क्यूँ आज तक सोचा नहीं माँ की ममता है जरुरी तो पापा का भी नाम जरुरी . बिन बोले वो समज जाते, चाहते हम किया है, सपने जो हम देख लेते है उन्हें पूरा करते माँ-पाप है , आँखे मेरी खुल गई पापा का प्यार नजर आया ममता के प्यार को आज मैंने पापा के दिल मैं भी पाया .

                                            माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो !
                                           ’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो !            
                                            मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ के तूफान समेट रखे हैँ,
                                             मिले तुम्हे सारी खुशी वो अरमान बनाये रखे है ,

है  मेरी ये ज़िम्मेदारी उदास कोई घर में न हो,
 तकलीफेँ सारी में झेलूँ और तुम सब बस खुश रहो,
खुशियाँ सारी तुम्हेँ दे सकूँ, इस कोशिश मे लगा रहा,
लोरिया का समय काम में देकर, भविष्य को तेरे आसा बनाता रहा  

                                                हैँ समाज का नियम कुछ ऐसा, पिता सदा गम्भीर रहे,
                                                 मन मे भाव छुपे हो लाखोँ, पर आँखो से नीर न बहे!
                                              भूला नही मुझे हैँ याद अब तक, तुतलाती मीठी बोली,
                                                     पल-पल बढते हर पल मे, जो यादोँ की मिश्री घोली,

कन्धोँ पे वो बैठ के उसका यहाँ वहां संग मेरे घूमना
होली और दीवाली पर भी पैसे लेने में झिझकना
माँ से हाथ-खर्च मांगना, मुझको देख सहम जाना,
और जो डाँटू ज़रा कभी, तो आंसू आँख मे थम जाना,
                                                 माँ जैसा है प्यार दिल में , दीखाने की झमता नहीं
                                               भोली सूरत देख कर , मन मेरा भी उदास होता है सही 

अब जो तुम हो गए हो बड़े तो , प्यार मैं भी दिखलाऊंगा,
माँ की तरह ही ममतामयी हूँ मैं भी , तुमको ये बतलाऊंगा,
कुछ देर बैठ कर तू चला गया , बस बात वही दो-चार हुई,
पिता का पद कुछ ऐसा ही हैँ यह, कह कर,  खुद को समझाऊंगा!