Thursday, 12 April 2012

जिन्दगी का मेला.


जिन्दगी के मेले कभी कम न होंगे अफ़सोस अब हमे न होंगे, जी हाँ यह बात बिल्कुल सही है कि हमने जब से इस दुनिया में जन्म लिया तभी से यह मेला भी शुरू हुआ और जब हम सब रुक जाएँगे तभी इस मेले का रुकना संभव है उससे पहले नहीं.
                             हम सब जानते है कि जिन्दगी एक सफ़र है सुहाना और इस सुहाने सफ़र का हम सब मजा ले रहे है पर फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ इस सफ़र का आनंद ले रहे है तो कुछ भगवन से अपना सफ़र जल्दी ख़त्म करने की दुआ मांग रहे है, जो इंसान अपनी जिन्दगी ख़ुशी से जी रहे है जिन्हें अपनी जरा भी परवाह नहीं, 
           

 वही जिन्दगी का मेला खुशी से घूम पाता है और जो इंसान हर वक्त बस दुनिया दारी की बातो में उलझा रहता है वो कभी इस दुनिया को और उसके मेले का आनंद नहीं उठा पाता क्यूंकि हर वक्त वो अहंकार नामक रष के चंगुल में ही फसा रहता है  और, इस अहंकार के जाल से यह व्यक्ति कभी अपना पीछा छुड़ा नहीं सकता यह लोग बस यही सोचते रहते है की  मेरा परिवार, मेरा पति, मेरा बच्चा, मेरा घर, यह लोभी लोगो का काम है और लोभी कभी कहीं संतुष्ट नहीं रह सकते, ईसाई देवता का मानना है की आकाश में उड़ते हुए उन पक्षियों को देखो जिन्हें चिंता नहीं की वो क्या खाएँ, क्या पहने , कहाँ रहे, पर  इश्वर उन पर सदा अपनी कृपा
बनाये  रखता है और उन परिंदों को किसी  की कोई परवाह नहीं इसीलिए वो अपनी जिन्दगी  के मेले का आनंद लेते है और हम इंसान बस यही सोचते रहते है की आज हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं , आज हम कहाँ रहे बस यही कारन है की हम इस सुन्दर सफ़र का आनंद नहीं ले पाते, इसलिए हमे भी उन परिंदों की तरह अपनी डोर उस उपर वाले के हाथ में ही छोड़ देनी चाहिए. और अपनी जिंदगी को खुशी से जीते जाना चाहिए साथ ही साथ हर मुश्किल का सामना बड़े ही सोच समझ कर करना चाहिए , ऐसा करने से शायद हम भी जिन्दगी के मेले को देख पायेंगे.
                                         

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