August 2010 , 2nd year of graduation (3rd sem) in Dayalbagh Educational Institute, Agra.
मैं रेनू सिंह, ग्रेजुएशन फस्ट इयर की छुट्टियों के बाद सेकिंड इयर की पढाई के लिए कॉलेज पहुंची. उस दिन हम सभी दोस्त मिले और खूब मस्ती की हम सब से बातें करते थे , हमारी क्लास बहुत अच्छी और एकसाथ रहेने वालो मे से थी. पर बात तो ये भी सच है की " वक़्त कब कैसा मोड़ दिखा दे ये हमे भी पता नहीं चलता. एसा ही कुछ मेरे साथ हुआ.
सितम्बर में हमारे फस्ट टेस्ट शुरु हुए. हम सभी दोस्त एक साथ एक ही लाइन में टेस्ट देने के लिए बैठ गए . मेरे पीछे मेरी एक दोस्त ( D.S ) बैठी फिर जब हमारा टेस्ट हमे मिला तो मुझे उस में कुछ भी नहीं आ रहा था इसलिए मेरी टेंशन बढ गई और उसी समय मेरे पीछे बैठी मेरी दोस्त ने मुझसे पूछा रेनू मुझे बता दे तो मैंने उसे मना कर दिया जब मुझे ही कुछ नहीं आता तो मैं उसे किया बताती, थोड़ी ही देर में हमारा टेस्ट ख़त्म हो गया और सभी दोस्त कमरे से बाहर निकलने लगे जब में कमरे से बाहर निकली तो मेरे पूछने पर की टेस्ट कैसा हुआ है किसी ने भी मुझसे बात नहीं कि मुझे तो पता ही नहीं चल रहा था कि हुआ क्या है मेरे दोस्त जो टेस्ट से पहेले मुझसे बातें कर रहे थे अब अचानक से उन्हें हुआ किया है इसी सोच में पहला दिन तो निकल गया लेकिन जब दूसरा दिन आया तो उस दिन भी मुझसे कोई नहीं बोला में समझ गई कि जिस दोस्त को मैंने टेस्ट में बताया नहीं था उसने ही सब को मुझसे बोलने के लिए मना कर दिया है .
मेरे न बताने कि बजह से ये सब हुआ था पर मैं अपने दोस्त को गलत भी तो नहीं बता सकती थी लेकिन इस बात को तो कोई समझ ही नहीं रहा था. क्लास में मैं जिस सीट पर बैठती उस सीट पर कोई नहीं बैठता था. सब साथ खाना खाते लेकिन मैं अकेले ही खाती और कभी नहीं भी खाती क्यूँ कि मैं बहुत ही अकेली हो गई थी मैं उन लोगो के बीच में मनो फस गई थी जब भी वो सभी हस्ते- खेलते मैं अकेले ही बैठकर अपनी कॉपी में से पड़ती रहती. हर शाम को जब मैं घर पहुँचती तो बहुत रोती, और ये दिल कि बात मैं घर में भी नहीं बता सकती थी क्यूँ कि पापा और घर के सभी लोगो को भी दर्द होगा इसलिए बंद कमरे में बैठ कर घंटो रोती और यही दुआ करती कि सुबह न हो ताकि मैं कॉलेज जाने से बच जाउं पर ये तो सिर्फ एक कल्पना ही थी ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन था . इस तरह वक़्त निकलता गया और 6 महीने हो गये. 6 महीने निकलने के बाद जब हमारा ( 3rd sem ) रिजल्ट आया तो देखा कि पूरी क्लास में मेरे ही सबसे जादा मार्क्स आये थे उस समय मैं बहुत खुश हुई.
उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि दोस्त , रिश्ते , नातें ये कुछ नहीं है सफर में कब कोई साथ छोड़ दे ये पता ही नहीं चलता है इसलिए अकेले ही जीना है और अपने आप ही सब करना है . मुझे अब उन दोस्तों कि भी जरुरत नहीं थी क्यूँ कि मैंने अपनी पहचान बना ली है. फिर एक दिन अचानक 4th सेम में मुझसे मेरी एक दोस्त ने बात की मुझे उससे बात करके अच्छा लग रहा था पर इतने महीनो से जो मैं अकेली थी तो मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था . धीरे-धीरे मुझसे सब बात करने लगे पर अभी भी वो लड़की मुझसे बात नहीं करती थी जिस की बजह से इतना कुछ हुआ. फिर नये साल वाले दिन हम सब एक दुसरे को मुबारकवाद (विश ) कर रहे थे तो उसने मुझे भी विश किया पहेले तो मैं सोचने लगी की ये क्या हुआ पर फिर सब नोर्मल सा लगने लगा क्यूँ कि वो समझ कई थी की जो हुआ वो गलत था .
लेकिन मुझे ये भी अच्छे से याद था कि यदि आज ये दोस्त मेरे साथ है तो किस तरह से है, मैं इन सब में अपनी पढाई को नहीं भूलना चाहती क्यूँ की कही न कहीं उसी की बजह से आज ये मेरे दोस्त बने इस तरह मैं सब के साथ भी रहने लगी और पढाई भी करने लगी फिर जब हम BHSC Honours में आये उस समय भी मैंने पूरी मेहनत कि और उस में भी मैंने ही टॉप किया और फिर जो हुआ वो मेरे जीवन कि सबसे अच्छी और पहली उपलब्धि थी उन 6 महीनो की सबसे प्यारी उपलब्धि जो है वो है मेरा " मेडल ".
जिस वक़्त मैं दयालबाघ के प्रेसिडेंट से मेडल ले रही थी उस वक़्त मैं उस लड़की का शुक्रिया कर रही थी क्यूँ की अगर वो एसा न करती तो आज मैं इस मेडल की भी हक़दार नहीं होती . और शायद मुझे अपने अंदर छुपी ये अच्छाई भी नजर नहीं आ पाती की मैं भी बहुत कुछ कर सकती हूँ .
MORAl ( सीख):- मैंने अपने उन दिनों से ये शिखा की जिन्दगी मैं हमेशा अकेले ही चलना चाहिए क्यूँ की कब कौन साथ छोड़ दे ये हमे पता ही नहीं चलता इसलिए:-
साथ तुम सबका दो पर
खुद एकला ही चोलो .
और :-
एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे sssssss
मैं रेनू सिंह, ग्रेजुएशन फस्ट इयर की छुट्टियों के बाद सेकिंड इयर की पढाई के लिए कॉलेज पहुंची. उस दिन हम सभी दोस्त मिले और खूब मस्ती की हम सब से बातें करते थे , हमारी क्लास बहुत अच्छी और एकसाथ रहेने वालो मे से थी. पर बात तो ये भी सच है की " वक़्त कब कैसा मोड़ दिखा दे ये हमे भी पता नहीं चलता. एसा ही कुछ मेरे साथ हुआ.
सितम्बर में हमारे फस्ट टेस्ट शुरु हुए. हम सभी दोस्त एक साथ एक ही लाइन में टेस्ट देने के लिए बैठ गए . मेरे पीछे मेरी एक दोस्त ( D.S ) बैठी फिर जब हमारा टेस्ट हमे मिला तो मुझे उस में कुछ भी नहीं आ रहा था इसलिए मेरी टेंशन बढ गई और उसी समय मेरे पीछे बैठी मेरी दोस्त ने मुझसे पूछा रेनू मुझे बता दे तो मैंने उसे मना कर दिया जब मुझे ही कुछ नहीं आता तो मैं उसे किया बताती, थोड़ी ही देर में हमारा टेस्ट ख़त्म हो गया और सभी दोस्त कमरे से बाहर निकलने लगे जब में कमरे से बाहर निकली तो मेरे पूछने पर की टेस्ट कैसा हुआ है किसी ने भी मुझसे बात नहीं कि मुझे तो पता ही नहीं चल रहा था कि हुआ क्या है मेरे दोस्त जो टेस्ट से पहेले मुझसे बातें कर रहे थे अब अचानक से उन्हें हुआ किया है इसी सोच में पहला दिन तो निकल गया लेकिन जब दूसरा दिन आया तो उस दिन भी मुझसे कोई नहीं बोला में समझ गई कि जिस दोस्त को मैंने टेस्ट में बताया नहीं था उसने ही सब को मुझसे बोलने के लिए मना कर दिया है .
मेरे न बताने कि बजह से ये सब हुआ था पर मैं अपने दोस्त को गलत भी तो नहीं बता सकती थी लेकिन इस बात को तो कोई समझ ही नहीं रहा था. क्लास में मैं जिस सीट पर बैठती उस सीट पर कोई नहीं बैठता था. सब साथ खाना खाते लेकिन मैं अकेले ही खाती और कभी नहीं भी खाती क्यूँ कि मैं बहुत ही अकेली हो गई थी मैं उन लोगो के बीच में मनो फस गई थी जब भी वो सभी हस्ते- खेलते मैं अकेले ही बैठकर अपनी कॉपी में से पड़ती रहती. हर शाम को जब मैं घर पहुँचती तो बहुत रोती, और ये दिल कि बात मैं घर में भी नहीं बता सकती थी क्यूँ कि पापा और घर के सभी लोगो को भी दर्द होगा इसलिए बंद कमरे में बैठ कर घंटो रोती और यही दुआ करती कि सुबह न हो ताकि मैं कॉलेज जाने से बच जाउं पर ये तो सिर्फ एक कल्पना ही थी ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन था . इस तरह वक़्त निकलता गया और 6 महीने हो गये. 6 महीने निकलने के बाद जब हमारा ( 3rd sem ) रिजल्ट आया तो देखा कि पूरी क्लास में मेरे ही सबसे जादा मार्क्स आये थे उस समय मैं बहुत खुश हुई.
उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि दोस्त , रिश्ते , नातें ये कुछ नहीं है सफर में कब कोई साथ छोड़ दे ये पता ही नहीं चलता है इसलिए अकेले ही जीना है और अपने आप ही सब करना है . मुझे अब उन दोस्तों कि भी जरुरत नहीं थी क्यूँ कि मैंने अपनी पहचान बना ली है. फिर एक दिन अचानक 4th सेम में मुझसे मेरी एक दोस्त ने बात की मुझे उससे बात करके अच्छा लग रहा था पर इतने महीनो से जो मैं अकेली थी तो मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था . धीरे-धीरे मुझसे सब बात करने लगे पर अभी भी वो लड़की मुझसे बात नहीं करती थी जिस की बजह से इतना कुछ हुआ. फिर नये साल वाले दिन हम सब एक दुसरे को मुबारकवाद (विश ) कर रहे थे तो उसने मुझे भी विश किया पहेले तो मैं सोचने लगी की ये क्या हुआ पर फिर सब नोर्मल सा लगने लगा क्यूँ कि वो समझ कई थी की जो हुआ वो गलत था .
लेकिन मुझे ये भी अच्छे से याद था कि यदि आज ये दोस्त मेरे साथ है तो किस तरह से है, मैं इन सब में अपनी पढाई को नहीं भूलना चाहती क्यूँ की कही न कहीं उसी की बजह से आज ये मेरे दोस्त बने इस तरह मैं सब के साथ भी रहने लगी और पढाई भी करने लगी फिर जब हम BHSC Honours में आये उस समय भी मैंने पूरी मेहनत कि और उस में भी मैंने ही टॉप किया और फिर जो हुआ वो मेरे जीवन कि सबसे अच्छी और पहली उपलब्धि थी उन 6 महीनो की सबसे प्यारी उपलब्धि जो है वो है मेरा " मेडल ".
जिस वक़्त मैं दयालबाघ के प्रेसिडेंट से मेडल ले रही थी उस वक़्त मैं उस लड़की का शुक्रिया कर रही थी क्यूँ की अगर वो एसा न करती तो आज मैं इस मेडल की भी हक़दार नहीं होती . और शायद मुझे अपने अंदर छुपी ये अच्छाई भी नजर नहीं आ पाती की मैं भी बहुत कुछ कर सकती हूँ .
MORAl ( सीख):- मैंने अपने उन दिनों से ये शिखा की जिन्दगी मैं हमेशा अकेले ही चलना चाहिए क्यूँ की कब कौन साथ छोड़ दे ये हमे पता ही नहीं चलता इसलिए:-
साथ तुम सबका दो पर
खुद एकला ही चोलो .
और :-
एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे sssssss
ज़िन्दगी का सफर साथी एकला चोलो रे
हो कोई भी डगर साथी
एकला चोलो रे !








