Saturday, 24 March 2012

एकला चौलो रे .

 August 2010 , 2nd year of graduation (3rd sem) in Dayalbagh Educational Institute, Agra.

मैं रेनू सिंह,  ग्रेजुएशन फस्ट  इयर की छुट्टियों के बाद सेकिंड इयर की पढाई के लिए कॉलेज पहुंची.  उस दिन हम सभी दोस्त मिले और खूब मस्ती की हम सब से बातें करते थे ,  हमारी क्लास बहुत अच्छी और एकसाथ रहेने वालो मे से थी.  पर बात तो ये भी सच है की  " वक़्त कब कैसा मोड़ दिखा दे ये हमे भी पता नहीं चलता. एसा ही कुछ मेरे साथ हुआ.
                                    सितम्बर में हमारे फस्ट टेस्ट शुरु हुए.  हम सभी दोस्त एक साथ एक ही लाइन में टेस्ट देने के लिए बैठ गए . मेरे पीछे मेरी एक दोस्त ( D.S ) बैठी फिर जब हमारा टेस्ट हमे मिला तो मुझे उस में कुछ भी नहीं आ रहा था इसलिए मेरी टेंशन बढ गई और उसी समय मेरे पीछे बैठी मेरी दोस्त ने मुझसे पूछा  रेनू  मुझे बता दे तो मैंने उसे मना कर दिया जब मुझे ही कुछ नहीं आता तो मैं  उसे किया बताती,  थोड़ी ही देर में हमारा टेस्ट ख़त्म हो गया और सभी दोस्त कमरे  से बाहर निकलने लगे जब में कमरे  से बाहर  निकली तो मेरे पूछने पर की टेस्ट कैसा हुआ है किसी ने भी मुझसे बात नहीं कि मुझे तो पता  ही नहीं चल रहा था कि हुआ क्या है मेरे दोस्त जो टेस्ट से पहेले मुझसे बातें कर रहे थे अब अचानक से उन्हें हुआ किया है इसी सोच में पहला दिन तो निकल गया लेकिन  जब दूसरा दिन आया तो उस दिन भी मुझसे कोई नहीं बोला में समझ गई कि जिस दोस्त को मैंने  टेस्ट में बताया नहीं था उसने ही सब को मुझसे बोलने के लिए मना कर दिया है .
       मेरे न बताने कि बजह से ये सब हुआ था पर मैं  अपने दोस्त को गलत भी तो नहीं बता सकती थी लेकिन इस बात को तो कोई समझ  ही नहीं रहा था.  क्लास में मैं जिस सीट पर बैठती उस सीट पर कोई नहीं बैठता था.  सब साथ खाना खाते  लेकिन  मैं अकेले ही खाती और  कभी नहीं भी खाती क्यूँ कि मैं बहुत ही अकेली हो गई थी मैं उन लोगो के बीच में मनो फस गई थी जब भी वो सभी हस्ते- खेलते मैं अकेले ही बैठकर अपनी कॉपी में से  पड़ती रहती.  हर शाम को जब मैं घर पहुँचती तो बहुत रोती,  और ये दिल कि बात मैं घर में भी नहीं बता सकती थी  क्यूँ कि पापा और घर के सभी लोगो को भी दर्द होगा इसलिए बंद कमरे  में बैठ कर घंटो रोती और यही दुआ करती कि सुबह न हो ताकि मैं कॉलेज जाने से बच जाउं  पर ये तो सिर्फ एक कल्पना ही थी ऐसा होना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन था . इस तरह वक़्त निकलता  गया और 6 महीने हो गये.  6 महीने निकलने के बाद जब हमारा ( 3rd sem ) रिजल्ट आया तो देखा कि पूरी  क्लास में  मेरे ही सबसे जादा  मार्क्स आये थे उस समय मैं बहुत खुश हुई.
        उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि दोस्त , रिश्ते , नातें ये कुछ नहीं है सफर में कब कोई साथ छोड़ दे ये पता ही नहीं चलता है इसलिए अकेले ही जीना है और अपने आप ही सब करना है . मुझे अब उन दोस्तों कि भी जरुरत नहीं थी क्यूँ कि मैंने अपनी पहचान बना ली है.  फिर एक दिन अचानक  4th  सेम में मुझसे मेरी एक दोस्त  ने बात की मुझे उससे बात करके अच्छा लग रहा था पर इतने महीनो से जो मैं अकेली थी तो मुझे कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था . धीरे-धीरे मुझसे सब बात करने लगे पर अभी भी वो लड़की मुझसे बात नहीं करती थी जिस की बजह से इतना कुछ हुआ.  फिर नये साल वाले दिन हम सब एक दुसरे को मुबारकवाद (विश ) कर रहे थे तो उसने मुझे भी विश किया पहेले तो मैं सोचने लगी की ये क्या हुआ पर  फिर सब नोर्मल सा लगने लगा क्यूँ कि वो समझ कई थी की जो हुआ वो गलत था .
               लेकिन  मुझे ये भी अच्छे से याद था कि यदि आज ये दोस्त  मेरे साथ है तो किस तरह से है, मैं इन सब में अपनी पढाई को नहीं भूलना चाहती क्यूँ की कही न कहीं  उसी की बजह से आज ये मेरे दोस्त बने इस तरह मैं सब के साथ भी रहने लगी और पढाई भी करने लगी फिर जब हम BHSC Honours में आये उस समय भी मैंने  पूरी मेहनत कि और उस में भी मैंने ही टॉप किया और फिर जो हुआ वो मेरे जीवन कि सबसे अच्छी और पहली उपलब्धि थी उन 6 महीनो की सबसे प्यारी उपलब्धि जो है  वो है मेरा  " मेडल ".
                                               जिस वक़्त मैं दयालबाघ  के प्रेसिडेंट से  मेडल ले रही थी उस वक़्त मैं उस लड़की का शुक्रिया कर रही थी क्यूँ की अगर वो एसा न करती तो आज मैं इस मेडल की भी हक़दार नहीं होती . और शायद मुझे अपने अंदर छुपी ये अच्छाई भी नजर नहीं आ पाती की मैं भी बहुत कुछ कर सकती हूँ .

MORAl ( सीख):- मैंने अपने उन दिनों से ये शिखा की जिन्दगी मैं हमेशा अकेले ही चलना चाहिए क्यूँ की कब कौन साथ छोड़ दे ये हमे पता ही नहीं चलता इसलिए:-
                                  साथ तुम सबका दो पर
                                  खुद एकला ही चोलो .
और :-
                                  एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे sssssss
                                  ज़िन्दगी का सफर साथी एकला चोलो रे
                                  हो कोई भी डगर साथी
                                  एकला चोलो रे !






Friday, 23 March 2012

चाहती हूँ माँ का प्यार .


बेटी की सहेली होती है माँ
अच्छे से उसको समझती है माँ
न जाने क्यूँ ये रीत बनी
माँ को छोडनी पड़ गई बेटी  अपनी,

                       मुझे भी प्यार चाहिये
                        माँ का वो लाड़ चाहिये 

मैं भी चाहती  हूँ  बात करू
माँ से सबकी शिकायत करू
क्यूँ वो मेरे साथ नहीं
सर पर उसका हाथ नहीं,

                        मुझे भी प्यार चाहिये
                        माँ का वो लाड़ चाहिये


बिन माँ तेरे हूँ मैं अकेले
बात ये सबसे कहती नहीं
आँखों में आसु आते है जब       
सबके सामने रोती मैं नहीं ,  
                        
                       मुझे भी प्यार चाहिये
                        माँ का वो लाड़ चाहिये 

था बचपन जो बीत गया
तेरी यादों में जी लिया
रोती जब भी थी तेरे लिए
पापा ने खिलोनों से मना लिया 

                        अब मेरी वो घडी है
                        दिल की बात जो कहनी है 
                        नहीं रुकते आंसु मुझ पर
                         याद जब तेरी आती है ,

मुझे भी प्यार चाहिये
माँ  का वो लाड़ चाहिये

                         महसूस होती है कमी आपकी
                          बेरंग  लगती है दुनिया सारी 
                          कहने को तो सब है मेरे पास
                         मुझे चाहिये बस,  एक तेरा ही साथ,

मुझे भी प्यार चाहिये
माँ का वो लाड़ चाहिये

                        माँ तुमसे करनी है बातें बहुत
                        आजाओ एक बार तो अब
                        जान तो लो बेटी  का दर्द
                        मिल तो लो एक बार ही अब ,

सर पर प्यार से हाथ फिराओ
खाने में मनपसंद खिलाओ
गोद में सर रखवा के 
दर्द को मेरे सुनते जाओ,

                        मुझे भी प्यार चाहिये
                        माँ का वो लाड़ चाहिये

आँखे तरस रही है मेरी
देखने को एक तेरी छवि
में भी अब चाहती  हूँ माँ
 गले लगना, एक बार ही सही

                        जब भी कोई कहता माँ
                       उस पल मैं थम जाती हूँ माँ
                       दिल मेरा भी चाहता है
                        एक बार ही सही,  कहने  को माँ


 मुझे भी प्यार चाहिये
माँ का वो लाड़ चाहिये !!
                        
                     


                                               

                        





 
                                            

Sunday, 11 March 2012

अंदाज पापा का .

नाम है निराला  उनका
अंदाज भी निराला है, ।।


स्वाभाव से उनके झलकता
ज्ञान का प्याला है,


          दिखने में तो सिर्फ
          वो सीधे -साधे इंसान है,


           कायदे में है बड़े और
            रुतवे में भी शान है,


नाम है निराला  उनका
अंदाज भी निराला है, ।।


जब भी बात आई समाज सेवा की
आगे चलकर हाथ बढ़ाते,


              लोगो की मदद करने
               पहले से वो है जाते,


                जहाँ खड़े हो जाते वो
                लोगो में छा जाते वो,


बाते शुरू हो जाने पर
आवाज से पहचाने जाते वो,


नाम है निराला  उनका
अंदाज भी निराला है, ।।


                  किसी को होती जब परेशानी
                  भागा आता पापा के पास,


                   जल्द अपनी परेशानी बताते
                   हल उसका पापा से लेते,


सुनकर उसकी परेशानी को
समझाते आसानी से वो ,


नाम है निराला  उनका
अंदाज भी निराला है, ।।


                 मुश्किल चाहे कैसी भी हो
                 समाज या लोगो की हो,


                पहले सबूतों को खोजते
                फिर उसके नतीजे पर पहुंचते,


लोगो को आता है चालाकी करना
पापा से बस काम अपना काम निकालना,


इन सब चालाकी को समझते है वो
सबको आपना बनाते जाते है वो,


                         
                   नाम है निराला  उनका                   
                   अंदाज भी निराला है, ।।


                    रिश्तों की जब बात आई
                    मान सम्मान में बढ गए वो,


अपनों से बड़ो के साथ
छोटो को भी आदर देते है वो,


रखते है वो धेर्य इतना
किसी से नहीं है वैर उनका,


                 परिवार के रखवाले है
                 समाज को चाहने वाले है,


                  नाम है निराला  उनका                   


                  अंदाज भी निराला है, ।।




                  
   
  


  .

तेरे साथ सुहाना सफर..

जब से दोनों चले है साथ
हाथों में हाथ डाल कर यार,


         तब से पाई है हर खुशी
         खुशी में शामिल हुये है हमी,


                    चाहे वो कैसा भी मोड़ हो
                    खुशी या गम की ओर हो,


                                रहेंगे साथ हर मोड़ पर
                                सहेंगे सब मिल बाट कर,


                                              मोड़ ऐसा भी आया था
                                              जहाँ बचना न हो पाया था,


                                              पर किस्मत ने साथ दिया
                                              तूने बचा के निकाल लिया,






दर्द तो तुझे भी हुआ था
फिर क्यों इतना चाहा था,


           परवाह न करके अपने दर्द की
           मुझे मनाने आया था,


                       मोड ऐसा भी आया था
                       जहाँ बचना मुश्किल हो गया था,


                                   दवे पांव की आहट से आकर
                                    फिर तूने ही सम्भाला था,


                                                 वादा लिया की मैं न रोंउ     
                                                  पर खुद की आँखों में पानी था,
                                               
                                                                   तेरा  साथ सुहाना सफर
                                                                       कहना ये हर बार ही था, ।।                   




                                   जानता था समझेगी नहीं
                                    मेरे बिन जियेगी नहीं,






किस तरह आँसु दिखा दूँ  इसे
दुबारा कैसे तडपा दूँ इसे,
      
              कैसे चलूंगी बिन तेरे
              इस सफर में  मैं अकेले,


                        साथ तेरा है तो हर
                         मुश्किल भी आसान है,


                                   विश्वास तेरा है तो
                                   जीना मेरा भी अरमान है ,


                                                जब से दोनों चले है साथ
                                                हाथों में हाथ डाल कर यार, ।।


                                                  छोड़ता था कभी किस्मत पर
                                                   अब करता अपने आप है ,






ये कहना है मेरे साथी का
जो करता बहुत इंतजार है,


               क्या करती हूँ , कब करती हूँ
                रखता है हर पल की खबर,


                             क्यूँ करती हूँ , कैसे करती हूँ
                              पूछता है हर बाट को मगर,


                                               अब भी  पलों को याद करके
                                                हस्ते दोनों साथ है,


                                                               झगड़ा  करना बढ गया है
                                                               ये भी कोई बात है,


                                                                माना गलती मैं करती हूँ
                                                                झगड़ा तुम क्यूँ करते हो,






पलकों पर रखा है तुमने
फिर क्यूँ खोने से डरते हो,


                    माना जिंदगी लम्बी है
                    जीना तो पर साथ है,


तेरा  साथ सुहाना सफर
कहना ये हर बार है, ।।                   


                     
                                                                 
                                                                                                              

मुँह से निकले नाम " लड्डू ".

कहने को तो नाम है " लड्डू "
पर इस नाम में जान है " लड्डू ",।।


             सोचा ना था कहूँगी " लड्डू "
             मन से ये निकला है " लड्डू "


                           है प्यारे नाम और भी " लड्डू "
                           पर खास है तेरा ही नाम " लड्डू "


                                         जब भी कहती हूँ में " लड्डू "
                                         हाँ बोल, कहता है मेरा " लड्डू "




कहने को तो नाम है " लड्डू "
पर इस नाम में जान है " लड्डू ",।।


            चाहे मेरा गुस्सा छुये आसमा को
             या उसका छुये धरती को,


                            सामने आता है तो वस
                            यही एक नाम है मेरा " लड्डू "


                                       
                                           जब भी बातें उसकी होती
                                            दोस्तों से वस यही में कहती,




दिखने में सीधा है " लड्डू "
बोलने में टेड़ा मेरा " लड्डू "


              कहने को तो नाम है " लड्डू "
              पर इस नाम में जान है " लड्डू ",।।


                             भोला भाला है वो प्यारा
                             मेरे सपनो का वो सहारा,


                                         बिन " लड्डू " आँखे ना खोलू
                                         बिन " लड्डू " मैं भी ना सोउ,




यदि मैं कह ना पाऊ " लड्डू "
जल्द  टोकता है मेरा " लड्डू "


               आज हुआ किया है तुम्हें
               " लड्डू " कहा नहीं है हमें,


                              जब तक केहेल्बा ना लेता " लड्डू "
                              बात मेरी ना सुनता " लड्डू "


                                               कहने को तो नाम है " लड्डू " 
                                                पर इस नाम में जान है " लड्डू ",।।




जब भी बात आई नाम की
मुँह से निकला है सिर्फ " लड्डू "


             पहचान भी बन गई " लड्डू " से
             अरमान भी बन गए " लड्डू " से


                              बंध गई में इस तरह " लड्डू " से
                              जिस तरह  डोर बंधी हो साथी से,


                                             अब तो पाना है " लड्डू " को
                                             हर राह में चाहना है " लड्डू " को,




आखिरी साँस तक कहती जाऊं
" लड्डू "  नाम कभी ना भूलाऊँ 


                     कहने को तो नाम है " लड्डू " 
                      पर इस नाम में जान है " लड्डू ",।।


                   


                                               

                              
               
    






 

                                

Saturday, 10 March 2012

"दहेज" एक अभिशाप .

आती है जब नन्ही परी                                    
इस प्यारे संसार में ।

                  देती है सबको खुशी,  अपने ही परिवार में,

नन्हे-नन्हे पैरों से
दिल सबका जीत लेती है,

                आती है जब नन्ही पारी , इस प्यारे संसार में ।।

पड़ती है धीरे-धीरे
बडती भी धीरे - धीरे है ,

                 मन लगता है सबसे ज्यादा ,  उसका घर परिवार में,

पापा की लाडली है तो
माँ की परछाई है वो,

                    घर की लक्ष्मी बेटिया ,  आखिर में पराई है वो,

पढाने  में माँ बाप इन्हें
करते पूरी मेहनत है,

                    कोई इन्हें कुछ कह न पाये,  धियान में रखते ये सब है,

आती है जब नन्ही पारी
इस प्यारे संसार में ।।

                    बड़ा होता देख बेटी को,  करते है सादी की बात,

सादी की बात करते ही
दहेज आता आड़े हाथ,

                    कौन नहीं चाहता है की ,   उसकी बेटी रहें खुश,

ख़ुशी के लिए ही तो देते है ,
अपनी बेटी को सब कुछ ,

                    फिर क्यों दहेज़ के लालची ,   माँगते है मुहँ से सब कुछ ,

लड़की ,बंगला ,और 2 कार
देदो कुछ पैसा भी यार,

                    आती है जब नन्ही परी,   इस प्यारे संसार में  ।।

शर्म नहीं उनकी आँखों में ,
या पहचान है ,गरीबी की ,

                       नाम बड़ा है ,लेकिन फिर भी ,   हरकत है ,नीचो जैसी ,

बनते लड़के बाले है ,
पर अक्ल नहीं दो पैसो की ,


                      मुहँ इतना खोलते है ,   दहेज़ लेने को दौड़ते है ,

भिखारी जैसी आदत इनकी
जितना दो उतना कम है ,

                     या तो विश्वास नहीं खुद पर ,   या फिर अपने बेटे पर

भला तो फिर वो  है
जो लड़की का बाप है,

                   देते हुए भी लड़की वाला ,   देता हर सम्मान है ,

बेटी को सब कुछ देकर
तुम्हे भी देता दान है,

                   हुआ अमीर फिर लड़की वाला ,   क्यों लड़के वालो को गुमान है,

दिल छोटा ,सोच छोटी ,
कहते अपने को महान है ,

                   बिना लिए दहेज़ तू खुद देख ,   तेरा मान सम्मान है,

आती है जब नन्ही परी
इस प्यारे से संसार में  ।।

                   कहना मेरा मान तो ,   दहेज़ लेना छोड़ तो,

फिर देख एक बार
बनेगा और भी महान तो,

                  तभी, कही जाती ये ,   मिलकर एक ही बात ,

दहेज़ प्रथा है
एक अभिशाप ।।
       



 
 


     


  

कहना है मेरा उन लोगो से जो डरते हैं आवाज उठाने से .

कहना है मेरा उन लोगो से ,
जो डरते है आवाज उठाने से ।।

              जब -जब बात आई राजनीती की ,
               तब -तब बात आई दंगो की भी,

                                                  बिन दंगो के नहीं कोई मेल,
                                                   राजनीती का यही है खेल,

                                                                                   जब -जब बात आई सरकार बनने की,
                                                                                     तब - तब बात आई निति की भी,
                                                                                                                                                                       
कुछ कहे ये सरकार हमारी बनेगी,
कुछ कहे ये सरकार हमारी बनेगी,
                 
                           कहना है मेरा उन लोगो से ,
                                  जो डरते है आवाज उठाने से ।।


                                                          ये खेल है सारा वोटो का ,
                                                           और कहें तो मताधिकार का ,

                                                                                      कोई कहें मेरा वोट बी.जे.पी को,
                                                                                    तो कोई कहें मेरा वोट कोंग्रस को,

देता जाता है ,मानव,
अपने ही अधिकार का वोट,

                     कहने को तो हर बार ही,
                      आती ये सरकार है,

                                     कहना है मेरा उन लोगो से, 
                                     जो डरते है आवाज उठाने से ।।

                                                        लोगो की आदत है वही,
                                                         कहते ये सरकार अच्छी नहीं,

तो फिर क्यूँ नहीं आवाज उठाते,
अच्छी सरकार को वो बनाते,

                          दिलाई आजादी जब गांधी ने,
                       तो क्यूँ नि आवाज उठानी है,     

कहना है मेरा उन लोगो से, 
जो डरते है आवाज उठाने से ।।

            हर मानव की आवाज में,
             होता वो अधिकार है,

                    जिस तरह अन्ना हजारे ने,
                       हिला दी पूरी सरकार है,

                                                   अकेले ने ही चल कर,
                                               सच्चाई का उजागर किया ,

लोगो ने जब ये देखा,
तो साथ उस आवाज का दिया, 

                     सोचा न था कभी,
                     ये पल भी आयेगा,  

                                     थे जब सभी साथ,
                                     और सरकार के खिलाफ,

                                                       था न कोई रास्ता,
                                                        सरकार के भी पास,

सुन्नी पड़ी सरकार को भी,
आम आदमी की वो आवाज,

                     झुकना पड़ा सरकार को भी,
                      अब तो खुद के ही खिलाफ,

                                                  होना चाहिए वो दम,
                                                  हर मानव की आवाज में,

           चलना चाहिए अकेले ही,
      उसे इस संसार में,



कहना है मेरा उन लोगो से, 
जो डरते है आवाज उठाने से ।।


                                                                                                          Written by:-
                                                                                                           Renu Singh.


      
 

                     

छोटी लड़की ..

ये बात है एक छोटी लड़की की,
 उम्र है जिसकी 8 साल, ।।

 कनक नाम है उसका,
 जो देती ख़ुशी -गम का एहसास,

न जाने कहा से लाई वो,
अपने साथ इतनी समझदारी,

घर मैं सबकी प्यारी है ,और,
बाबा की है लाड़ली,

उम्र कम है उसकी फिर भी,
रखती सबका धयान है,
      
घर के सभी सदस्यों को,
देती वो ज्ञान है,

जब भी कोई घर में आता ,
भाग कर उनका स्वागत करती,

बाबा सहाब जी के बुलाने पर,
 एक आवाज में दोड़ती जाती, 
                                             
दोड़ती में वस यही कहती जाती,
जी बाबा सहाब जी, आई,

ये बात है एक छोटी लड़की की,
उम्र है जिसकी 8 साल, ।।

बाबा सहाब का कहना सुनकर,
पानी देने वो है जाती,

जो देखता है उसे,
कहता एक ही बात है,

बच्ची बहुत प्यारी है,
बच्ची बहुत समझदार है,

ये बात है एक छोटी लड़की की,
उम्र है जिसकी 8 साल, ।।

है नहीं जरा भी आलस,
उसके फुर्ती है शरीर में,

दिखने में गुडिया जैसी है ,
बातों में हेरानी है,

जिद्द करना आता नहीं उसे,
गुस्सा भी आता नहीं है,

जब भी टुकटुक आती है,
दे देती सब कुछ अपना है,

करती हूँ धन्यबाद उस माँ का,
जिसने इसको जन्म दिया,

और करती हूँ उसका भी धन्यबाद,
जिस परिवार में रहकर ये सीखा,          

ये बात है एक छोटी लड़की की,
उम्र है जिसकी 8 साल, ।।
     
कहने को तो ये है अपने,
बुआ ,चाचा की भी प्यारी,

पर न जाने क्यों ये अपने,
बाबा की है बहुत लाड़ली,

प्यारी तो ये मम्मी की और,
अपने पापा की भी है ,

पर न जाने क्यूँ ये है ,
अपने बाबा की ही सबसे  प्यारी,  
 
ये बात है एक छोटी लड़की की,
उम्र है जिसकी 8 साल, ।।
 

 

हूँ मैं जिददी, कहते हैं सभी...

हूँ  मैं जिददी, कहते हैं सभी,
पापा भी कहते हैं, यही ।।

                           नहीं, शिकायत मुझे दुनिया से,
                           हैं, शिकायत तो वस् पापा से, 

क्यों दिया बचपन से इतना प्यार,
कहने से पहले पूरी की हर बात ,

                              हूँ मैं जिददी कहते है सभी ,
                              पापा भी कहते हैं यही ।।


जब भी गलती मैं  करती ,
डांट भईया को पड़ती,

                               गलती जब मैं करती हूँ,
                              तो, क्यों नहीं, डांट मुझको पड़ती,

अच्छे से जानती हूँ मैं,
की पापा की रानी हूँ मैं,

                                हूँ मैं  जिददी कहते है सभी,
                               पापा भी कहते है  यही ।।

अगर पापा ने डाँटा मुझको,
तो नाराज हो जाती हूँ मैं,

                                 कमरे में अकेले बेठ कर,
                                 सोचने लग जाती हूँ मैं ,

फिर थोड़ी ही देर में,
वापस मान जाती हूँ मैं,

                                     
                                  हूँ मैं  जिददी कहते है सभी,
                                  पापा भी कहते है  यही ।।

जब भी बंटी ने माँगा कुछ 
तो पापा ने कहा ," अभी नहीं" ,



                                     पर जब मैंने माँगा कुछ ,
                                     तो क्यों , पापा ने कहा, "अभी "

बेटी हूँ पापा की,
क्या इतना भी समझती नहीं,

                                         कहते हो जिददी,
                                          पर मानते हो बात सभी ,

जब मैंने माँगा ,गाड़ी ,मोबाइल ,लेप्पी,
क्यों हाँ, करके पापा ने मुझे कर दिया हैप्पी,

                                               हूँ मैं जिददी कहते हैं सभी,
                                                पापा भी कहते हैं  यही ।।   


                                                                                                              Written by:-
                                                                                                        Renu Singh.
 
                       

बात समझदारी की .

कहने को तो छोटा है, मेरा भाई ,
               पर बातें करता है ,समझदारी की ।।

       
चिन्ता करता है, भविष्य की ,
        पर बात न माने किसी की ,

                   पापा ,भईया जब समझाते ,
                         सुनता है बड़े धयान ,

                      लगता  है, सब समझ रहा है ,
                                                                                          पर असल मे होता है, वो बोर,

 कहने को तो छोटा है ,मेरा भाई,
  पर बाते करता है, समझदारी की  ।। 

                 कहता है मन मे, हो गयी अब तो,
                  जाने दो मुझको दोस्तों के साथ बहार,

                                   अभी में हूँ बहुत छोटा,
                                   न दो मुझको  इतना भार,

                                                   हो गया है २० का पर,
                                                          कहता है हूँ 18 का मैं,

कहने को तो छोटा है,  पर
बाते समझदारी  की ।।

                जब आता मेरे पास,
                 कहता छोटी क्या करूँ मैं ,

                              मुझे  भी कोई राह दिखाओ,
                               पापा जैसा मुझे बनाओ,

                                         है, भोला भाला, सबका प्यारा,
                                         आदत नहीं उसकी ख़राब,

                                                             भूखा किसी को सोने न दे,
                                                             खुद भी भूखा  रह न पाए,

                                                                               कहता क्यों डरते हो, अंधरे से ,
                                                                               गलती अंधरे की नहीं हमारी है,

कहने मे है वो छोटा, पर
बात  समझदारी की है ।।

                       न जाने क्यों भईया से डरता है वो, इतना
                         एक आवाज पर भईया की भागा चला आता है वो,

                                                      जानता है अच्छे से की ,
                                                       भईया  को सबसे प्यारा है वो,

                                                                               न जाने फिर भी क्यों,
                                                                               भईया से इतना डरता है वो,

 कहने में है वो छोटा , पर
बाते  समझदारी की ।।

                                                                                                                      Written by:-
                                                                                                                      Renu Singh.