हमारे देश में ये रीत तो बहुत समय पहले से चली आ रही है , हर भाई और बहेन का ये अनमोल रिश्ता हर छेत्र के कोनो कोनो में मनाया जाता है आखिर क्यूँ नहीं मनाया जाए चाहिए, ये त्यौहार है ही ऐसा जो जिन्दगी भर की रक्षा करने का होता है हर भाई अपनी बहेन से और हर बहेन अपने भाई से यही कहती की, जिन्दगी में चाहे कुछ भी हो चाहे कैसे भी मोड़ आ जाये पर हम हमेशा साथ ही रहेंगे और एक दुसरे की रक्षा करेंगे , और जब इस तियोहार की बात आये तो हर भाई - बहेन के मुह से यही गाना सुनने को मिलता है "'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना.... !

इस गीत को जब आप गुनगुनाते हैं तब दिल में एक अजीब-सी हलचल पैदा होती है। दिल कुछ अलग ही गुनगुनाने लगता है। लेकिन आज के युग में हर त्योहार का महत्व कुछ कम हो गया है। त्योहार मनते तो सभी हैं परंतु उसमें दिखावटीपन काफी हद तक बढ़ चुका है। फैशन के इस बढ़ते युग में त्योहार की कुछ खास कडि़याँ पीछे छूट जाती है।
भागदौड़
भरी जिंदगी, फैशनेबल और स्टेट्ससिंबल का दिखावा बढ़ने के कारण ये त्योहार
पुराने जमाने के रीति-रिवाजों को कहीं पीछे छोड़ आए हैं। अब जहाँ एक भाई
राखी की डोर के बंधन को पूरी ईमानदारी से निभाता है। वहीं कई ऐसे भी हैं जो
जरा-सी बोलचाल, जरा-सा झगड़ा होने पर एक-दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करने के
साथ-साथ मारपीट से लेकर मर्डर करने पर उतारू हो जाते हैं।

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