न जाने कौन सा ये भवर है
मुझे उलझाता जा रहा आज-कल है,
उलझनों को सुलझाने की बजह
भटकाता जा रहा आज-कल है,
सोच की गहराइयों में खो गई हूँ मैं
बहार निकलने का रास्ता भी भूल गई हूँ मैं,
अब तो ये उलझन बढती जा रही है
दिल, दिमाग को सताती जा रही है,
ये भी समझ नहीं आता है
सुलझाने की बात तो दूर
उलझन मैं उलझता जा रहा है
क्या बात है ऐसी पता नहीं
जो इतना सताती जा रही है
दिन को हफ्ते, हफ्ते को महीने मैं
जो यूँ ही बदलती जा रही है
थक चूका है दिमाग भी
सोचना कुछ चाहता नहीं है,
तकलीफ इससे जादा अब
तकलीफ इससे जादा अब
ये भी लेना चाहता नहीं,
क्यूँ की उलझन मैं दिल-दिमाग भी उलझता जा रहा दिन रात है
गुस्सा इतना बड़ गया है कि भूल गया उलझन की ही बात है!!

good renu..
ReplyDelete